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संपादकीय मंथन और चिंतन हिमाचल प्रदेश: मौसम के बिगड़े मिज़ाज से हिलती अर्थव्यवस्था

RamParkash Vats
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हिमाचल प्रदेश, जिसे देवभूमि और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक माना जाता है, आज मौसम के कहर से कराह रहा है। मानसून का असामान्य और विनाशकारी स्वरूप इस पहाड़ी राज्य की न केवल जीवनरेखा को चोट पहुँचा रहा है, बल्कि इसकी अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट दे रहा है। भारी बारिश, बादल फटना और भूस्खलन की घटनाओं ने पूरे प्रदेश को मानो ठहर-सा दिया है।

बीते दो महीनों के आँकड़े बताते हैं कि हालात कितने भयावह हैं। 155 से अधिक लोगों की मौत और 37 लोगों का लापता होना केवल संख्या नहीं, बल्कि एक ऐसी मानवीय त्रासदी है जिसे आँकड़ों से नहीं आँका जा सकता। 484 से अधिक सड़कें, जिनमें दो राष्ट्रीय राजमार्ग भी शामिल हैं, बंद हो चुकी हैं। करीब 793 सड़कें अवरुद्ध हैं, 956 पावर ट्रांसफॉर्मर और 517 जल आपूर्ति योजनाएँ ठप हैं। बच्चों की पढ़ाई बाधित हुई है क्योंकि कई जिलों में स्कूल बंद पड़े हैं। अब तक लगभग ₹2,394 करोड़ का आर्थिक नुकसान दर्ज किया गया है—यह केवल प्रारंभिक अनुमान है।

कुल्लू में बादल फटने से पुल और दुकानें बह गईं, तो किन्नौर की कैलाश यात्रा रद्द करनी पड़ी। मण्डी में एक चार-तल भवन ध्वस्त हो गया, सौभाग्य से पहले ही खाली करवा लिया गया था। मंडी और कुल्लू जैसे ज़िलों में सड़कें, बिजली और जल योजनाएँ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। सेब की खेप तक सुरक्षित नहीं रह पाई; फल मंडियों तक पहुँचने से पहले ही ढुलाई रुक गई। फल व्यापार, जो हिमाचल की अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है, पूरी तरह ठप पड़ा है।

विशेषज्ञों की चेतावनी और मौसम विभाग की भविष्यवाणी इस संकट को और भयावह बनाती है। इस वर्ष अब तक हिमाचल में 554% अतिरिक्त वर्षा दर्ज हुई है। यानी, प्राकृतिक संतुलन बुरी तरह बिगड़ा है और यह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी है। आने वाले दिनों में और भारी बारिश की संभावना है, जिसका अर्थ है कि संकट अभी समाप्त नहीं हुआ।

हिमाचल प्रदेश की यह स्थिति केवल एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं, बल्कि हमारी विकास नीतियों और पर्यावरण के साथ असंतुलित छेड़छाड़ का नतीजा भी है। अंधाधुंध निर्माण, चार-लेन सड़कों के लिए पहाड़ों का सीना चीरना, और जलधाराओं को बाधित करना प्रकृति के साथ संघर्ष का रूप ले चुके हैं। आज जब पहाड़ खिसक रहे हैं और जीवन अस्त-व्यस्त है, तो यह सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या हमारी विकास योजनाएँ वास्तव में टिकाऊ हैं?

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