( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ‘आरएसएस’ का 100 बर्ष का सफर इतिहास संघर्षमयी और मुश्किलों भरा रहा लेकिन राष्ट्र हित को सर्वोपरि रखा) संपादक राम प्रकाश वत्स

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का शताब्दी दिवस—27 सितंबर, 2025—भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक क्षेत्र में एक ऐतिहासिक पड़ाव है। यह संस्था अब अपने 100 वर्ष पूरे कर रही है, जिसने न केवल विचारधारा के स्तर पर, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में व्यापक प्रभाव डाला है।
आरएसएस: स्थापना और पृष्ठभूमि
आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयादशमी के दिन की थी। हेडगेवार, लोकमान्य तिलक के अनुयायी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व सदस्य थे। संस्था की आवश्यकता इसलिए महसूस की गई, ताकि हिंदू समाज को संगठित किया जा सके और उसमें आत्मबल, अनुशासन और सामाजिक एकता लाई जा सके, विशेषत: ब्रिटिश शासन के दौर के सामाजिक विघटन को देखते हुए।
संगठन की विकास यात्रा
स्थापना के शुरुआती वर्षों में आरएसएस ने नागपुर और उसके आस-पास की शाखाओं के माध्यम से जमीनी स्तर पर मजबूत नींव रखी। समय के साथ यह संस्था देशभर में फैल गई। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान संगठन ने प्रत्यक्ष राजनीति से खुद को दूर रखा, परन्तु चरित्र निर्माण, आपदा सेवा कार्य और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में स्वयंसेवकों को लगातार तैयार किया। विभाजन के समय बंगाल, पंजाब, कश्मीर सहित अनेक प्रांतों में विस्थापितों की सहायता आरएसएस ने की।
प्रमुख प्रतिबंध व चुनौतियाँ
संघ पर तीन बार (1948, 1975, 1992) प्रतिबंध लग चुका है, लेकिन हर बार यह संकट से और अधिक मजबूत बनकर उभरा। 1948 में गांधी हत्या के बाद, 1975 में आपातकाल, और 1992 में बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान इसे प्रतिबंधित किया गया था।
प्रमुख उपल्बधियाँ और विस्तार
वर्तमान समय में आरएसएस विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है, जिसमें भारत सहित 80 से अधिक देशों में 80,000 से अधिक दैनिक शाखाएँ संचालित हो रही हैं। संगठन के प्रभाव से ‘संघ परिवार’ के रूप में भारतीय जनता पार्टी, विश्व हिंदू परिषद, छात्र परिषद, महिला मोर्चा, सेवा भारती, संस्कार भारती आदि अनेक संगठन खड़े हुए हैं।
विचारधारा और कार्यक्षेत्र
आरएसएस की मूल विचारधारा हिंदुत्व, भारतीय संस्कृति और सभ्यता के संरक्षण एवं नवोन्मेष पर आधारित है। यह एक गैर-राजनीतिक, सांस्कृतिक-सामाजिक संस्था मानी जाती है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रवाद, चरित्र निर्माण, युवाओं में नेतृत्व एवं सेवा भाव पैदा करना और समाज को संगठित करना रहा है।
समकालीन महत्व एवं शताब्दी समारोह
आरएसएस ने शताब्दी वर्ष पर संघ विभिन्न संवाद, व्याख्यान शृंखला और समाज में पहुंच बढ़ाने के कई कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। प्रमुख कार्यक्रमों में दिल्ली सहित कई बड़े शहरों में तीन दिवसीय संवाद, बुद्धिजीवियों से संवाद, और हर गांव-हर घर तक पहुंचने की योजना शामिल है। सरसंघचालक मोहन भागवत के नेतृत्व में संस्था अगले 100 वर्षों की दिशा भी तय कर रही है।
सारगर्भित है कि आरएसएस का शताब्दी वर्ष न केवल उसके यात्रा के 100 वर्ष पूर्ण होने का जश्न है, बल्कि भारतीय समाज के सामूहिक, सांस्कृतिक, वैचारिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का एक प्रतीक भी है। इस संस्थान ने भारतीय समाज को व्यवस्थित, एकजुट और सेवा-प्रधान बनाने की दिशा में अमिट योगदान दिया है। आने वाली पीढ़ियों के लिए आरएसएस का यह शताब्दी वर्ष प्रेरणा का उत्सव है।

