संपादकीय दृष्टि कोण संपादक राम प्रकाश वत्स
मैं रहूँ या न रहूँ, लेकिन मेरा सपना है कि भारत रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बने। आने वाली पीढ़ियाँ गर्व से कहें कि हमने सुरक्षा और सामर्थ्य में किसी पर आश्रित रहने की सोच को पीछे छोड़ दिया।” – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भारत का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जब-जब हमने अपनी ताकत पर भरोसा किया है, तब-तब हमने वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। आज़ादी से पहले भी और आज़ादी के बाद भी, भारत ने कठिन दौर देखे। कभी हमें विदेशी शासन ने गुलाम बनाया, तो कभी आधुनिक दौर में हमें रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी तकनीक और हथियारों पर निर्भर रहना पड़ा। लेकिन 21वीं सदी का भारत अब उस राह पर चल पड़ा है जहाँ उसकी आत्मा “आत्मनिर्भरता” से जुड़ी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह विचारधारा केवल शब्द नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा और गौरव की धड़कन है।—मोदी दृष्टि: विचारधारा और आत्मविश्वास का प्रतिबिंबनरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है उनका अटूट आत्मविश्वास। वे बार-बार कहते हैं – “भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति, एक अद्भुत ऊर्जा और एक अदम्य संकल्प है।” यही संकल्प आत्मनिर्भर भारत अभियान का मूल है।
मोदी जी की विचारधारा में तीन प्रमुख आयाम साफ़ दिखाई देते हैं:
1. देशभक्ति और आत्मसमर्पण – राष्ट्र सर्वोपरि है। व्यक्तिगत जीवन चाहे रहे या न रहे, लेकिन राष्ट्र की अस्मिता बनी रहनी चाहिए।
2. आत्मनिर्भरता पर अडिग भरोसा – किसी भी क्षेत्र में, विशेषकर रक्षा क्षेत्र में, आत्मनिर्भर होना ही असली आज़ादी है।
3. वैश्विक नेतृत्व की दृष्टि – भारत केवल अपनी सुरक्षा ही नहीं, बल्कि विश्व शांति का भी रक्षक बने।

भारत की सुरक्षा नीति समय के साथ बदलती रही है। आज़ादी के बाद हमारे पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने “अहिंसा और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व” को प्राथमिकता दी। लेकिन 1962 का चीन युद्ध और 1965-1971 के पाकिस्तान युद्धों ने हमें सिखाया कि आदर्शवाद के साथ-साथ मज़बूत सैन्य शक्ति भी आवश्यक है।
भारत की सुरक्षा नीति: परंपरा से आधुनिकता तक
1974 में पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण और 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार द्वारा “शक्ति” परीक्षण ने भारत को वैश्विक सुरक्षा मानचित्र पर स्थापित कर दिया। इसके बाद भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल आत्मरक्षा के लिए शक्ति का प्रयोग करेगा, आक्रामकता के लिए नहीं।
मोदी युग में यह नीति और व्यापक हुई है। “सर्जिकल स्ट्राइक” और “बालाकोट एयर स्ट्राइक” इस नीति का उदाहरण हैं। संदेश साफ़ है – भारत शांति चाहता है, लेकिन यदि उसकी संप्रभुता पर हमला होगा तो वह जवाब देने में हिचकेगा नहीं।—

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता क्यों ज़रूरी है? भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक देशों में से एक रहा है। यह हमारी सुरक्षा नीति की सबसे बड़ी कमजोरी रही। दुश्मन को पता होता है कि यदि हमारे आपूर्ति शृंखला पर प्रहार कर दिया जाए तो हमारी रक्षा प्रणाली प्रभावित हो सकती है।
मोदी सरकार ने इस पर गहरी चोट की।
“आत्मनिर्भर भारत” अभियान में रक्षा क्षेत्र को सबसे ऊपर रखा गया। इसके पीछे चार बड़े कारण हैं:
1. राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूती – विदेशी हथियारों पर निर्भरता खतरे को बढ़ाती है।
2. आर्थिक आत्मनिर्भरता – अरबों डॉलर की आयात लागत को स्वदेशी निर्माण में बदलना।
3. रोज़गार और उद्योग का विस्तार – रक्षा उत्पादन देश के युवाओं के लिए नए अवसर लाता है।
4. वैश्विक पहचान – हथियार निर्माता देश बनने से भारत की विश्व में प्रतिष्ठा और प्रभाव बढ़ता है।—

आत्मनिर्भर रक्षा: उपलब्धियाँ और पहल :-मोदी सरकार ने रक्षा क्षेत्र में कई ऐतिहासिक कदम उठाए:मेक इन इंडिया और डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर –
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में दो बड़े कॉरिडोर स्थापित।100% एफडीआई तक खुलापन –
ताकि विदेशी निवेशक भारत में रक्षा निर्माण कर सकें।आयात पर प्रतिबंध सूची –
दर्जनों हथियार और उपकरणों को आयात से हटाकर स्वदेशी उत्पादन के लिए अनिवार्य किया गया।स्वदेशी तकनीक का विकास –

तेजस लड़ाकू विमान, आकाश मिसाइल प्रणाली, अग्नि और पृथ्वी श्रृंखला की मिसाइलें, अर्जुन टैंक और हाल ही में सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया एयर डिफेंस वेपन सिस्टम (AADWS)।ड्रोन और साइबर सुरक्षा –
आधुनिक युद्ध की नई ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए।–
वैश्विक परिप्रेक्ष्य: भारत का संदेशभारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति केवल अपने लिए नहीं, बल्कि विश्व को भी संदेश देती है। आज दुनिया बहुध्रुवीय हो चुकी है। शक्ति संतुलन बदल रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और एशिया में बढ़ती तनाव की स्थितियों ने यह साबित किया है कि किसी भी देश को अपनी सुरक्षा दूसरों पर छोड़ना खतरनाक है।भारत का वैश्विक संदेश है:हम आक्रामक नहीं, लेकिन सक्षम हैं।हम शांति के पक्षधर हैं, लेकिन समझौते की कीमत पर नहीं।हम हथियारों का निर्माण करेंगे, लेकिन केवल रक्षा और वैश्विक सहयोग के लिए।-
चुनौतियाँ और भविष्य की रणनीतिरक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की यात्रा आसान नहीं है। चुनौतियाँ अनेक हैं:1. उच्च स्तरीय तकनीक की कमी।2. अनुसंधान एवं विकास (R&D) में सीमित निवेश।3. निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच समन्वय की आवश्यकता।4. वैश्विक हथियार बाज़ार की प्रतिस्पर्धा।इन चुनौतियों का समाधान भी मोदी सरकार ने सुझाया है
रक्षा अनुसंधान में स्टार्टअप और निजी क्षेत्र को बढ़ावा।”इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस (iDEX)” जैसी योजनाएँ।अंतरराष्ट्रीय सहयोग में “मित्र राष्ट्रों” के साथ संयुक्त उत्पादन।युवाओं को रक्षा तकनीक में शिक्षा और प्रशिक्षण देन

मोदी की व्यक्तिगत विचारधारा: राष्ट्र ही सर्वोपरिमोदी जी का जीवन एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्र नेतृत्व तक पहुँचना ही इस बात का प्रमाण है कि वे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा से ज़्यादा राष्ट्रहित को प्राथमिकता देते हैं। वे बार-बार कहते हैं ।”यह कुर्सी मेरे लिए पद नहीं, सेवा का अवसर है।”उनके लिए देशभक्ति का अर्थ केवल भावनात्मक नारा नहीं, बल्कि कर्मठता और आत्मसमर्पण है। उनका यह कथन ।”मैं रहूँ या न रहूँ…” – उनके व्यक्तित्व का सार है। यह केवल प्रधानमंत्री का कथन नहीं, बल्कि एक साधक का संकल्प है, जो अपने जीवन को राष्ट्र के लिए अर्पित कर चुका है।–
आज जिस राह पर चल रहा है, वह केवल वर्तमान पीढ़ी की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह आने वाले सौ वर्षों की तैयारी है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता केवल हथियार बनाने का अभियान नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा को सशक्त करने का प्रयास है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह सोच आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक होगी। जब कल का भारत अपने बच्चों को यह बताएगा कि हमने विदेशी निर्भरता छोड़कर अपनी ताकत पर भरोसा किया, तब यह यात्रा पूरी होगी।संदेश साफ़ है –

