
न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स
: शतरंज की बिसात पर नई चालराजनीति को अक्सर शतरंज के खेल से तुलना की जाती है, जहां न तो कोई स्थायी मित्र होता है और न ही स्थायी शत्रु। केवल स्वार्थ, परिस्थितियां और रणनीतियां ही तय करती हैं कि किस मोहरे को आगे बढ़ाना है और किसे बलिदान करना है।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति इस समय ठीक इसी दौर से गुजर रही है।भाजपा ने हाल ही में सुजानपुर से पूर्व विधायक राजेंद्र राणा को राज्य का वरिष्ठ प्रवक्ता नियुक्त किया है। यह वही राणा हैं, जिन्होंने वर्ष 2017 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल को उन्हीं के गढ़ सुजानपुर से हराकर राजनीति की धारा बदल दी थी।
कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुके राणा को संगठन में अहम पद देना भाजपा की रणनीति का हिस्सा है। लेकिन इस निर्णय ने संगठन के भीतर कुछ असहजता भी पैदा कर दी है।चर्चा है कि प्रो. धूमल का खेमा इस ताजपोशी से संतुष्ट नहीं है। स्वाभाविक भी है—जिस नेता ने कभी आपको चुनावी हार का स्वाद चखाया हो, उसकी पार्टी में एंट्री और फिर सम्मानजनक जिम्मेदारी निश्चित ही मनोवैज्ञानिक खटास पैदा करती है। यही वजह है कि प्रदेश भाजपा के भीतर यह सुगबुगाहट बढ़ी कि वरिष्ठ धूमल समर्थक कहीं किनारे न कर दिए जाएं।
शायद यही कारण है कि नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर और भाजपा संगठन महामंत्री सिद्धार्थन ने हमीरपुर पहुंचकर प्रो. धूमल से उनके समीरपुर स्थित आवास पर मुलाकात की। यह भेंट महज़ शिष्टाचार नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था—कि पार्टी अब भी अपने वरिष्ठ नेताओं की राय और सम्मान को महत्व देती है।
दरअसल, भाजपा हिमाचल में इस समय संगठनात्मक संतुलन साधने की चुनौती से जूझ रही है। एक ओर नई ऊर्जा और नए चेहरों की जरूरत है, तो दूसरी ओर पुराने और अनुभवी नेताओं की नाराजगी से बचना भी जरूरी है। यदि दोनों के बीच तालमेल न बैठा, तो पार्टी का आंतरिक समीकरण डगमगा सकता है।इस परिप्रेक्ष्य में यह कहना गलत न होगा कि हिमाचल भाजपा एक बार फिर शतरंज की बिसात पर खड़ी है। चालें चली जा चुकी हैं, लेकिन मात किसे मिलेगी और जीत किसके हिस्से आएगी—यह आने वाला समय ही बताएगा।

