न्यूज़ इंडिया आजतक: संपादक राम प्रकाश वत्स
र्पौग बांध से अचानक छोड़े गए पानी ने निचले क्षेत्रों में जो तबाही मचाई है, वह केवल एक प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की गंभीर विफलता का उदाहरण है। खेत-खलिहान, घर, सड़कें और स्कूल पानी में डूब गए हैं। ग्रामीणों की मेहनत से तैयार फसलें चौपट हो गईं और लोगों के जीवन पर संकट का साया गहरा गया। सवाल यह है कि हर साल मानसून के मौसम में वही हालात क्यों दोहराए जाते हैं? क्या प्रशासन और भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) को केवल आपदा घटित होने के बाद राहत कार्यों में ही सक्रिय होना है, या फिर पूर्व नियोजन और पारदर्शी जल प्रबंधन इसकी जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए?
बीबीएमबी की ओर से हर बार यही तर्क दिया जाता है कि बढ़ते जलस्तर को देखते हुए सुरक्षा कारणों से पानी छोड़ा गया। परंतु सच यह है कि यह संकट अपर्याप्त तैयारी, देरी से निर्णय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी से उत्पन्न हुआ है। अगर समय रहते नियंत्रित मात्रा में पानी छोड़ा जाता और प्रभावित क्षेत्रों को चेतावनी देकर खाली कराया जाता तो नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता था।
विशेषज्ञ मानते हैं कि बांधों के जलस्तर का वैज्ञानिक मूल्यांकन और क्रमबद्ध जल निकासी ही इस संकट से निपटने का वास्तविक उपाय है।अब समय आ गया है कि पौंग बांध जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए स्थायी नीति बने। निचले इलाक़ों को “प्रतिबंधित क्षेत्र” घोषित करने, राहत केंद्रों की पूर्व व्यवस्था करने और प्रभावित गांवों को आपदा प्रबंधन की योजनाओं से जोड़े बिना स्थिति नहीं सुधरेगी। किसानों और ग्रामीणों की मांगों को गंभीरता से लेकर उन्हें योजना का हिस्सा बनाना होगा।
जल प्रबंधन केवल इंजीनियरिंग का विषय नहीं, बल्कि मानवीय सुरक्षा का प्रश्न है। इसलिए बीबीएमबी और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे बांधों की क्षमता और सुरक्षा उपायों का तत्काल और गहन पुनर्मूल्यांकन करें। जल संरक्षण को आपदा प्रबंधन से जोड़ते हुए सामूहिक, संयोजित और दायित्वपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया जाए।
पानी जीवनदाता है, लेकिन जब उसका प्रबंधन लापरवाही से किया जाए तो वही पानी विनाशक बन जाता है। इस आपदा से सबक लेते हुए हमें भविष्य की जल नीति को मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह बनाना होगा। वरना हर मानसून यही त्रासदी दोहराएगा और तबाही हमारी नियति बन जाएगी।

