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संपादकीय मंथन : शिक्षा विभाग के सामने खड़ा संकट – हिमाचल की पाठशालाओं का मौन

RamParkash Vats
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संपादक राम प्रकाश वत्स

यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है कि आज हिमाचल प्रदेश जैसे शिक्षित माने जाने वाले राज्य में भी शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को अब पाठशालाओं में घटती बच्चों की संख्या के आधार पर परखा जा रहा है। एक समय था जब पहाड़ी गाँवों की गलियों में सरकारी विद्यालयों की घंटियों की गूंज सुनाई देती थी, आज वे भवन वीरान होते जा रहे हैं। हालात इतने गंभीर हो चले हैं कि प्रदेश के कई जिलों में दर्जनों सरकारी स्कूल एक के बाद एक बंद किए जा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश में शिक्षा का बुनियादी ढांचा मजबूत रहा है, लेकिन अब यह आधार हिलता नज़र आ रहा है। उदाहरण के लिए चम्बा, सिरमौर, किन्नौर और लाहौल-स्पीति जैसे दुर्गम क्षेत्रों में स्थित सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार गिर रही है। वहीं शिक्षकों की संख्या में कोई कमी नहीं आई, बल्कि कई स्थानों पर पाँच शिक्षकों पर मात्र दो या तीन छात्र ही पढ़ाई कर रहे हैं। 2024 की शिक्षा विभागीय रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में लगभग अधिकांश स्कूलों में छात्रों की संख्या 20 से भी कम रह गई या फिर शून्य हो गई सैंकड़ों अध्यापक सरप्लस हो गऐ यह आँकड़ा राज्य की शिक्षा नीति की दशा-दिशा पर कठोर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

स्थिति इतनी भयावह हो चली है कि प्रदेश सरकार को कई प्राथमिक विद्यालयों का विलय करना पड़ा है। एकीकृत स्कूल योजना के तहत पिछले तीन वर्षों में हजारों स्कूल बंद कर या दूसरे स्कूलों में समाहित कर दिए गए हैं। अगर यह क्रम आगे भी यूँ ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब शिक्षा विभाग के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठने लगेंगे। यह भी संभव है कि भविष्य में जब विभागीय पुनर्गठन की आवश्यकता आए, तो अध्यापकों को अन्य प्रशासनिक या तकनीकी विभागों में समाहित करना पड़े। ऐसे में शिक्षा विभाग का स्वतंत्र अस्तित्व केवल कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगा।

सरकार को चाहिए कि इस संकट की घड़ी में केवल स्कूल भवनों की संख्या पर ध्यान न दे, बल्कि बच्चों की संख्या और उपस्थिति की गंभीरता से समीक्षा करे। माता-पिता का सरकारी स्कूलों से मोहभंग होना एक सामाजिक चेतावनी है। आज के दौर में वे निजी स्कूलों, ट्यूशन और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स को अधिक भरोसेमंद मानने लगे हैं, जो सरकारी शिक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता में आई गिरावट को दर्शाता है।

अब समय आ गया है कि हिमाचल प्रदेश सरकार और शिक्षा विभाग मिलकर इस स्थिति का गहन आत्ममंथन करें। शिक्षा नीति में परिवर्तन के साथ-साथ नवाचार, डिजिटल सशक्तिकरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की आधुनिक सुविधा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा। यदि हम चाहते हैं कि हिमाचल पुनः एक आदर्श शिक्षित राज्य के रूप में स्थापित हो, तो केवल नीति ही नहीं, नीयत में भी स्पष्टता लानी होगी।

अंततः यही कहा जा सकता है कि यदि शिक्षा विभाग को प्रासंगिक बनाए रखना है, तो उसे खुद को वर्तमान सामाजिक, तकनीकी और शैक्षणिक चुनौतियों के अनुरूप ढालना ही होगा। वरना, जिस मंत्रालय ने लाखों बच्चों की ज़िंदगी संवारी है, वह खुद अस्तित्व के संकट में डूब जाएगा।

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