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पुरुषों की बच्चेदानी का ऑपरेशन कब से होने लगा ?

RamParkash Vats
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हिमकेयर के कथित फर्जी बिलों पर सुक्खू का सवाल, भाजपा के जवाब और जांच की विश्वसनीयता के बीच उलझा हिमाचल का स्वास्थ्य तंत्र

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में इन दिनों हिमकेयर स्वास्थ्य योजना को लेकर एक ऐसा सवाल गूंज रहा है, जिसने सत्ता और विपक्ष दोनों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने चंबा जिले के भरमौर विधानसभा क्षेत्र के लिल्ह में आयोजित जनसभा में भाजपा विधायक डॉ. जनक राज पर निशाना साधते हुए सवाल किया— आखिर पुरुषों की बच्चेदानी का ऑपरेशन कब से होने लगा? मुख्यमंत्री का यह सवाल केवल राजनीतिक कटाक्ष नहीं, बल्कि हिमकेयर योजना के तहत सामने आई कथित बिलिंग अनियमितताओं की ओर संकेत करता है। लेकिन लोकतंत्र में सवाल जितना महत्वपूर्ण होता है, उसका प्रमाणित जवाब उससे भी अधिक महत्वपूर्ण होता है।हिमकेयर योजना की परिकल्पना आर्थिक रूप से कमजोर और पात्र परिवारों को स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से की गई थी। इसका मकसद यह था कि बीमारी के समय किसी गरीब परिवार को इलाज के खर्च के कारण अपनी जमा-पूंजी, जमीन या गहने बेचने की नौबत न आए। लेकिन जब इसी जनकल्याणकारी योजना के बिलों में कथित गड़बड़ियों के आरोप सामने आते हैं, तो सवाल केवल किसी सरकार या राजनीतिक दल का नहीं रह जाता, बल्कि सार्वजनिक धन की सुरक्षा और मरीजों के अधिकारों का बन जाता है। मार्च 2026 में विधानसभा में मुख्यमंत्री द्वारा आंतरिक ऑडिट के आधार पर संदिग्ध बिलिंग, महिला-विशिष्ट उपचार पैकेज और अन्य विसंगतियों का मामला उठाया गया था। इसके बाद राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने आठ सदस्यीय विशेष जांच दल गठित किया।

उन्होंने आरटीआई से प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए बताया था कि आईजीएमसी शिमला, कमला नेहरू अस्पताल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज टांडा में वर्ष 2019 से 2022 के दौरान पुरुष मरीजों की बच्चेदानी निकालने की सर्जरी का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। इस जानकारी के आधार पर उन्होंने मुख्यमंत्री के आरोपों पर सवाल उठाए। यहां एक बुनियादी तथ्य समझना जरूरी है कि किसी अस्पताल में ऐसी सर्जरी का रिकॉर्ड न मिलना और किसी मरीज के नाम पर महिला-विशिष्ट उपचार पैकेज का बिल दर्ज होना, दो अलग-अलग परिस्थितियां हैं। इनके बीच वास्तविक संबंध क्या है, इसका उत्तर मेडिकल रिकॉर्ड, उपचार विवरण, बिलिंग कोड और भुगतान की जांच से ही मिल सकता है।अब सवाल यह है कि यदि हिमकेयर के तहत गलत बिल प्रस्तुत किए गए, तो उनकी जांच किस स्तर तक पहुंची? भुगतान किस अस्पताल को हुआ? किस अधिकारी ने बिलों का सत्यापन किया? क्या मरीजों को वास्तव में उपचार मिला था? क्या किसी अस्पताल ने उपचार के नाम पर सरकारी खजाने से अनुचित भुगतान प्राप्त किया? और यदि किसी तकनीकी पैकेज कोड या दस्तावेजी त्रुटि को गलत अर्थ में प्रस्तुत किया गया है, तो उसका वास्तविक स्पष्टीकरण क्या है? इन सवालों का जवाब राजनीतिक मंचों से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और प्रमाणित दस्तावेजों से सामने आना चाहिए।यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी अधिकारी या चिकित्सक से पूछताछ होना दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है। इसी प्रकार किसी राजनीतिक व्यक्ति द्वारा आरटीआई के दस्तावेज प्रस्तुत करना भी पूरे मामले का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। कानून का तकाजा है कि आरोपों की जांच हो, संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिले और दोष सिद्ध होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

हिमाचल प्रदेश की जनता को इस राजनीतिक विवाद में किसी दल की जीत या हार से अधिक चिंता अपने स्वास्थ्य अधिकारों की है। हिमकेयर योजना यदि पात्र परिवारों के लिए सुरक्षा कवच है, तो उसकी पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। विपक्ष का दायित्व भी कम नहीं है। उसे आरोपों पर सवाल उठाने के साथ-साथ उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।हिमकेयर का मामला किसी एक बयान, एक आरटीआई या एक राजनीतिक आरोप से समाप्त नहीं हो सकता। यदि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है, तो जिम्मेदार लोगों की पहचान कर कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यदि आरोपों में तथ्यात्मक भ्रम है, तो सरकार को उसे भी स्पष्ट करना चाहिए। जनता को न राजनीतिक शोर चाहिए, न एक-दूसरे पर दोषारोपण की अंतहीन कहानी। जनता को चाहिए पारदर्शी जांच, जवाबदेही और सच्चाई।आखिरकार, हिमकेयर किसी राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि प्रदेश के पात्र नागरिकों के स्वास्थ्य और विश्वास से जुड़ी व्यवस्था है। इस योजना की विश्वसनीयता पर आंच आती है तो उसका नुकसान किसी एक सरकार को नहीं, बल्कि उन गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है, जिनके लिए अस्पताल का बिल जीवन की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है।सवाल पुरुषों की बच्चेदानी के ऑपरेशन का जरूर है, लेकिन असली परीक्षा सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही, स्वास्थ्य सेवाओं की पारदर्शिता और जांच की निष्पक्षता की है। हिमाचल की जनता को बयान नहीं, ब्योरे चाहिए; आरोप नहीं, प्रमाण चाहिए और राजनीति नहीं, न्याय चाहिए।

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