20 वर्षों तक पंजाब और हरियाणा करेंगे बिजली की आपूर्ति, भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं में हिमाचल की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी पर लगी अंतिम मुहर, 420.77 करोड़ रुपये की पूंजीगत लागत का भी होगा समायोजन।

नई दिल्ली/शिमला: हिमाचल प्रदेश के बिजली अधिकारों से जुड़े दशकों पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसका समाधान कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच भाखड़ा-नांगल तथा ब्यास जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित बिजली के बकाया हिस्से के भुगतान का फॉर्मूला निर्धारित कर दिया है। इस फैसले के तहत अब पंजाब और हरियाणा अगले 20 वर्षों में हिमाचल प्रदेश को कुल 11,973 मिलियन यूनिट (एमयू) बिजली उपलब्ध करवाएंगे। यह फैसला हिमाचल प्रदेश के उस अधिकार को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जिसके तहत राज्य को इन परियोजनाओं में 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सेदारी देने का प्रावधान किया गया था। इस मामले का संबंध वर्ष 1966 से चला आ रहा है और लगभग छह दशक से विभिन्न स्तरों पर इसका समाधान तलाशा जा रहा था।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का पूरा फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने केंद्र सरकार की ओर से तैयार किए गए बिजली के माध्यम से बकाया भुगतान के प्रस्ताव को स्वीकार किया। अदालत ने निर्देश दिया कि हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली बकाया बिजली की आपूर्ति अगले 20 वर्षों में पूरी की जाए। इसके तहत प्रत्येक वर्ष लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली दी जाएगी। यह आपूर्ति मुख्य रूप से कम जलप्रवाह वाले मौसम यानी अक्टूबर से मार्च के बीच की जाएगी। इससे हिमाचल प्रदेश को निर्धारित अवधि में चरणबद्ध तरीके से अपनी बकाया बिजली प्राप्त होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिजली की प्रत्येक किस्त प्राप्त होने वाले वर्ष के लिए भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) द्वारा निर्धारित शुल्क हिमाचल प्रदेश को देना होगा।
13,066 मिलियन यूनिट से कैसे तय हुआ 11,973 मिलियन यूनिट का आंकड़ा?
इस विवाद में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) ने हिमाचल प्रदेश की मूल बिजली हकदारी 13,066 मिलियन यूनिट आंकी थी। हालांकि, बांधों और संबंधित परियोजनाओं के निर्माण के दौरान पंजाब और हरियाणा की ओर से किए गए ऐतिहासिक पूंजीगत खर्च तथा ऋण अदायगी की राशि को भी ध्यान में रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश की इस मद में देनदारी 420.77 करोड़ रुपये निर्धारित की। इसमें पंजाब के हिस्से की देनदारी 249.23 करोड़ रुपये और हरियाणा के हिस्से की देनदारी 171.55 करोड़ रुपये आंकी गई। इस राशि का नकद भुगतान कराने के बजाय बिजली की बकाया हिस्सेदारी से समायोजन करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए बिजली की कीमत 3.85 रुपये प्रति यूनिट निर्धारित करते हुए लगभग 1,093 मिलियन यूनिट का समायोजन किया गया। इसके बाद हिमाचल प्रदेश को मिलने वाली शेष बिजली 11,973 मिलियन यूनिट रह गई। इस प्रकार अदालत ने नकद भुगतान के बजाय बिजली के रूप में बकाया निपटाने की व्यवस्था को मंजूरी दी।
2011 के फैसले से जुड़ा है पूरा विवाद
दरअसल, हिमाचल प्रदेश लंबे समय से भाखड़ा-नांगल और ब्यास परियोजनाओं में अपनी हिस्सेदारी की मांग करता रहा है। राज्य सरकार ने वर्ष 1996 में इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इसके बाद 27 सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने हिमाचल प्रदेश के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इन परियोजनाओं की बिजली में 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी का अधिकार स्वीकार किया था। यह अधिकार पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 के तहत निर्धारित व्यवस्था के आधार पर दिया गया था। अदालत ने हिमाचल की हिस्सेदारी को 1 नवंबर 1966 से भाखड़ा परियोजना, नवंबर 1977 से देहर परियोजना तथा जनवरी 1978 से पोंग बांध परियोजना के लिए लागू माना था। उसी फैसले में पंजाब की हिस्सेदारी 51.80 प्रतिशत और हरियाणा की हिस्सेदारी 37.51 प्रतिशत निर्धारित की गई थी। इसके बावजूद पिछले वर्षों में पुराने बकाये की गणना, पूंजीगत खर्च और भुगतान की समयसीमा को लेकर राज्यों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। \
तीनों राज्यों के बीच समयसीमा को लेकर अलग-अलग मांगें
बकाया बिजली के भुगतान की अवधि को लेकर भी राज्यों के बीच मतभेद सामने आए थे। हिमाचल प्रदेश चाहता था कि उसे उसकी बकाया बिजली 10 वर्षों के भीतर उपलब्ध करवाई जाए, जबकि पंजाब सरकार ने शुरुआत में केंद्र के 15 वर्षों के प्रस्ताव का विरोध किया और बाद में भुगतान की अवधि 30 वर्ष करने की मांग रखी। केंद्र सरकार की ओर से 15 वर्षों में भुगतान का प्रस्ताव दिया गया था। सभी पक्षों की दलीलें सुनने और राज्यों की आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 20 वर्षों की अवधि निर्धारित की। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके निर्देशों का पालन सभी संबंधित पक्षों को करना होगा। इस तरह वर्षों से लंबित मामले के समाधान के लिए एक निश्चित समयसीमा और बिजली आपूर्ति का व्यावहारिक फॉर्मूला तय हो गया है।
हिमाचल प्रदेश के लिए क्या होगा इसका महत्व?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का हिमाचल प्रदेश के ऊर्जा क्षेत्र और राज्य के दीर्घकालीन बिजली प्रबंधन के लिए महत्व है। अगले 20 वर्षों तक लगभग 598 मिलियन यूनिट सालाना बिजली मिलने से राज्य को अपनी ऊर्जा उपलब्धता की योजना बनाने में सहायता मिलेगी। विशेष रूप से सर्दियों के दौरान, जब हिमाचल प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं में पानी की उपलब्धता और बिजली उत्पादन में मौसमी उतार-चढ़ाव रहता है, उस समय यह बिजली आपूर्ति उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक आर्थिक लाभ बिजली की प्राप्ति, उस समय की मांग, उत्पादन और बीबीएमबी द्वारा निर्धारित शुल्क पर निर्भर करेगा।
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय हिमाचल प्रदेश की 7.19 प्रतिशत बिजली हिस्सेदारी से जुड़े पुराने कानूनी अधिकार को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण पड़ाव है। वर्ष 1996 में शुरू हुई कानूनी लड़ाई और वर्ष 2011 के फैसले के बाद भी जो बकाया विवाद लंबित था, उसके भुगतान की अब स्पष्ट व्यवस्था बन गई है। इससे पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के बीच दशकों से चले आ रहे बिजली बंटवारे के विवाद के समाधान का रास्ता साफ हो गया है।

