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करोड़ों खर्च के बाद भी मातृ-शिशु अस्पताल बंद, जनता पूछ रही—सरकारी योजनाओं का यह कैसा हश्र?

RamParkash Vats
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-करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मातृ-शिशु अस्पताल बंद, तीसरे दिन भी भूख हड़ताल जारी, जनता पूछ रही—माताओं और नवजातों को स्वास्थ्य सुविधा देने वाली योजना आखिर कब होगी साकार?

–अस्पताल के नाम पर सरकारी धन खर्च हुआ, लेकिन इलाज की सुविधा अब भी दूर; अकिल बख्शी की भूख हड़ताल ने व्यवस्था, जवाबदेही और सरकारी दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

—नूरपुर ही नहीं, जवाली, फतेहपुर, इंदौरा और चंबा के सीमावर्ती क्षेत्रों की उम्मीद बना अस्पताल वर्षों से बंद; जनता पूछ रही—भवन तैयार तो स्वास्थ्य सेवा शुरू क्यों नहीं?

मातृ-शिशु अस्पताल को लेकर बढ़ा जनाक्रोश, भूख हड़ताल तीसरे दिन पहुंची; जनता का सवाल—करोड़ों के सार्वजनिक धन से बनी सुविधा

नूरपुर में लंबे समय से बंद पड़े मातृ-शिशु अस्पताल को शुरू करवाने की मांग अब केवल एक सामाजिक मांग नहीं रह गई है, बल्कि यह क्षेत्र की जनता के बढ़ते आक्रोश और व्यवस्था से जवाब मांगने का मुद्दा बनती जा रही है। रंजीत बख्शी जनकल्याण फाउंडेशन के निदेशक अकिल बख्शी की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल रविवार को तीसरे दिन में प्रवेश कर गई। उनका कहना है कि अस्पताल को जल्द शुरू किया जाना चाहिए, ताकि नूरपुर ही नहीं बल्कि जवाली, फतेहपुर, इंदौरा और चंबा के सीमावर्ती क्षेत्रों की गर्भवती महिलाओं, माताओं और नवजात शिशुओं को स्थानीय स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। सवाल यह है कि जिस उद्देश्य से सरकारी धन खर्च कर स्वास्थ्य संस्थान तैयार किया गया, यदि वही संस्थान वर्षों तक अपने मूल उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पा रहा है तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है? जनता का सवाल सीधा है—अस्पताल कब शुरू होगा और अब तक इसे शुरू न कर पाने के कारणों का जवाब कौन देगा? अकिल बख्शी की भूख हड़ताल ने इसी सवाल को एक बार फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल सरकारी योजनाओं और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल को लेकर उठ रहा है। किसी भी अस्पताल का निर्माण केवल भवन खड़ा करने तक सीमित नहीं होता। उसके पीछे जमीन, निर्माण, मशीनरी, उपकरण, स्टाफ, बिजली-पानी, रखरखाव और स्वास्थ्य सेवाओं के संचालन पर सरकारी धन खर्च होता है। लेकिन यदि इतना सब होने के बावजूद अस्पताल मरीजों के काम नहीं आ रहा तो यह सवाल स्वाभाविक है कि योजना की वास्तविक सफलता का पैमाना क्या है—भवन का निर्माण या जनता को स्वास्थ्य सेवा मिलना? नूरपुर की जनता यह भी पूछ रही है कि मातृ-शिशु अस्पताल को शुरू करने में आखिर कौन-कौन सी प्रशासनिक, वित्तीय या तकनीकी अड़चनें हैं और उन्हें दूर करने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए। यदि स्टाफ की कमी है तो भर्ती कब होगी, उपकरणों की आवश्यकता है तो उनकी व्यवस्था कब होगी और यदि किसी अन्य कारण से अस्पताल बंद है तो सरकार उस कारण को सार्वजनिक क्यों नहीं करती? जनता को केवल आश्वासन नहीं, बल्कि स्पष्ट समयसीमा और जवाबदेही चाहिए। यही वह बिंदु है जहां एक विकास योजना और उसके धरातल पर परिणाम के बीच का अंतर दिखाई देता है। करोड़ों रुपये के संभावित सार्वजनिक निवेश के बाद भी यदि सुविधा जनता तक नहीं पहुंचती तो लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी योजनाओं का अंतिम लाभार्थी आखिर कब तक इंतजार करता रहेगा।

अकिल बख्शी का कहना है कि उनकी मांग किसी राजनीतिक दल के विरोध में नहीं, बल्कि नूरपुर की जनता के हित में है। उनका स्पष्ट आग्रह है कि मातृ-शिशु अस्पताल को जल्द से जल्द पूर्ण रूप से शुरू किया जाए। अब तीसरे दिन में पहुंची भूख हड़ताल ने प्रशासन और सरकार के सामने इस मुद्दे पर गंभीरता से जवाब देने की आवश्यकता बढ़ा दी है। क्षेत्र की जनता की अपेक्षा है कि सरकार इस मामले में केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहे, बल्कि अस्पताल की वर्तमान स्थिति, खर्च हुए सरकारी धन, उपलब्ध सुविधाओं, स्वीकृत पदों, नियुक्तियों और अस्पताल को शुरू करने में आ रही बाधाओं की स्थिति सार्वजनिक करे। जनता का सवाल किसी दल से नहीं, व्यवस्था से है—जिस अस्पताल की जरूरत माताओं और बच्चों के लिए थी, वह कब तक बंद रहेगा? अगर भवन तैयार है तो सेवा क्यों नहीं; अगर सेवा शुरू करने में कमी है तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी किसकी है; और अगर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं तो उसका वास्तविक लाभ जनता को कब मिलेगा? नूरपुर की यह मांग अब जवाबदेही की मांग बनती जा रही है। सरकार और प्रशासन के लिए चुनौती यही है कि इस सवाल का जवाब आश्वासन से नहीं, बल्कि अस्पताल को वास्तव में शुरू करके दिया जाए।

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