Reading: *गुरु की सेवा से ही शिष्य का कल्याण संभव है:- स्वामी मनप्रीत *

*गुरु की सेवा से ही शिष्य का कल्याण संभव है:- स्वामी मनप्रीत *

RamParkash Vats
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गुरु की शरण ही आत्मिक शांति का मार्ग, सत्संग में गूंजा गुरु महिमा का संदेश

नूरपुर: दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के बौड़ नूरपुर आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना से सराबोर रहा। क्षेत्रभर से पहुंचे श्रद्धालुओं ने सत्संग में भाग लेकर गुरु महिमा का श्रवण किया और भक्ति के रंग में रंग गए। कार्यक्रम का शुभारंभ सुमधुर भजन-कीर्तन से हुआ। गुरु भाई सुखदेव जी ने भक्ति रस से ओत-प्रोत भजनों की प्रस्तुति देकर वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। भजनों के दौरान संगत भावविभोर नजर आई और श्रद्धालुओं ने गुरु महिमा का गुणगान करते हुए आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया। आश्रम परिसर में श्रद्धा और भक्ति का ऐसा वातावरण बना कि हर ओर गुरु के प्रति समर्पण और आस्था की अनुभूति होती रही।

इस अवसर पर दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी मनप्रीत जी ने गुरु महिमा को मानव जीवन का आधार बताते हुए कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं, बल्कि मनुष्य को अज्ञानता के अंधकार से निकालकर आत्मज्ञान और सत्य के प्रकाश की ओर ले जाने वाले दिव्य मार्गदर्शक हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य भौतिक उपलब्धियों, धन और सुख-सुविधाओं के पीछे निरंतर दौड़ रहा है, लेकिन इन सबके बावजूद उसके भीतर शांति और संतोष का अभाव बना रहता है। वास्तविक आत्मिक शांति गुरु की शरण, ईश्वर भक्ति और आत्मचिंतन से प्राप्त होती है। स्वामी जी ने कहा कि गुरु की महिमा को केवल शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि गुरु मनुष्य के जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों को बदलने की क्षमता रखते हैं। गुरु का सान्निध्य व्यक्ति को स्वयं से परिचित कराता है और जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर अग्रसर करता है। उन्होंने संगत से आह्वान किया कि गुरु के बताए मार्ग पर चलते हुए सत्संग, साधना और सेवा को जीवन का हिस्सा बनाया जाए।

स्वामी मनप्रीत जी ने कहा कि गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल पूजा या वंदना तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि गुरु की शिक्षाओं को अपने आचरण में उतारना ही वास्तविक गुरु-भक्ति है। मानव सेवा, जरूरतमंदों की सहायता, सद्भावना और समाज के प्रति सकारात्मक जिम्मेदारी निभाना भी गुरु के प्रति समर्पण का महत्वपूर्ण स्वरूप है। उन्होंने कहा कि सत्संग मनुष्य के विचारों को शुद्ध करता है, साधना उसे भीतर से मजबूत बनाती है और सेवा उसके जीवन में करुणा एवं विनम्रता का भाव पैदा करती है। कार्यक्रम के समापन पर विश्व कल्याण तथा समस्त मानवता की सुख-शांति के लिए सामूहिक ध्यान-साधना करवाई गई। ध्यान के दौरान श्रद्धालुओं ने आंतरिक शांति और आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया। सत्संग का संदेश यही रहा कि जब जीवन में गुरु का प्रकाश आता है तो अज्ञान का अंधकार दूर होने लगता है और मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को पहचानने की दिशा में आगे बढ़ता है।

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