गुरु ज्ञान ही आत्मबोध का द्वार, भीतर के सत्य को पहचानना जरूरी : स्वामी विज्ञानानंद जी

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा अक्षय मैरिज पैलेस कुंस्सल में आयोजित पांच दिवसीय श्री हरि कथा के पांचवें एवं अंतिम दिन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा समापन अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर श्री हरि कथा का श्रवण किया। कार्यक्रम में दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य एवं कथा व्यास स्वामी विज्ञानानंद जी ने सत्संग तथा जीवन में तत्वदर्शी गुरु की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक संदेश प्रदान किया।

स्वामी विज्ञानानंद जी ने कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है और इसका वास्तविक उद्देश्य आत्मिक उन्नति एवं परमात्मा की प्राप्ति है। लेकिन आज का मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं की दौड़ में अपने जीवन के मूल उद्देश्य को भूलता जा रहा है। ऐसे समय में सत्संग मनुष्य को सही दिशा प्रदान करता है और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का माध्यम बनता है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार अंधकार में मार्ग दिखाने के लिए दीपक की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन रूपी यात्रा में तत्वदर्शी गुरु का मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है। गुरु ही मनुष्य को अज्ञानता से निकालकर सत्य, ज्ञान और भक्ति के मार्ग पर चलना सिखाते हैं। उन्होंने कहा कि केवल पुस्तक ज्ञान से परमात्मा की अनुभूति संभव नहीं है, बल्कि एक पूर्ण गुरु ही ईश्वर का वास्तविक ज्ञान प्रदान कर सकता है।

स्वामी जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि सत्संग मनुष्य के भीतर प्रेम, विनम्रता, सहनशीलता और सेवा भाव का विकास करता है। जब व्यक्ति गुरु के बताए मार्ग पर चलता है तो उसका जीवन सुख, शांति और संतोष से भर जाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तनाव, अशांति और नैतिक पतन का मुख्य कारण आध्यात्मिक मूल्यों से दूरी है, जिसे सत्संग और गुरु कृपा से दूर किया जा सकता है।
कथा के समापन अवसर पर भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर हरि नाम संकीर्तन में भाग लिया। कार्यक्रम के अंत में आरती एवं प्रसाद वितरण किया गया।सस्थान के सेवादारों द्वारा पांच दिनों तक कार्यक्रम की व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित की गई। स्वामी हरीशानंद जी ने सभी श्रद्धालुओं का सहयोग एवं सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया।

