Reading: **गुरु सेवा करते हुए मन को गुरु आज्ञा में बांध के रखना बहुत जरूरी है स्वामी विज्ञानानंद **

**गुरु सेवा करते हुए मन को गुरु आज्ञा में बांध के रखना बहुत जरूरी है स्वामी विज्ञानानंद **

RamParkash Vats
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बौड़ में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान का मासिक भंडारा, सत्संग और ध्यान साधना से भक्तिमय हुआ वातावरण

स्वामी विज्ञानानंद जी ने गुरु सेवा को बताया समर्पण, विनम्रता और श्रद्धा की साधना, बोले—गुरु की शिक्षाओं को जीवन में धारण करना ही सच्ची सेवा है।

बड़ी संख्या में पहुंची संगत ने भजन-कीर्तन, सत्संग और ध्यान साधना में लिया भाग, कार्यक्रम के समापन पर श्रद्धालुओं ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया।

बौड़ में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान का मासिक भंडारा एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित

नूरपुर। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से बौड़, नूरपुर में रविवार को मासिक भंडारे एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ किया गया। कार्यक्रम में क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में संगत ने भाग लिया और सत्संग, भजन-कीर्तन तथा ध्यान साधना का लाभ प्राप्त किया।कार्यक्रम का शुभारंभ प्रभु महिमा के भावपूर्ण भजन-कीर्तन से हुआ। भजनों की मधुर धुनों से वातावरण भक्तिमय हो गया और उपस्थित श्रद्धालु प्रभु भक्ति में भावविभोर नजर आए। इस अवसर पर नूरमहल से विशेष रूप से पधारे दिव्य गुरु पूज्य आशुतोष महाराज के परम शिष्य स्वामी विज्ञानानंद जी ने श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायक विचार प्रदान किए।

अपने प्रवचन में स्वामी विज्ञानानंद जी ने गुरु सेवा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि गुरु सेवा केवल बाहरी रूप से किसी कार्य को करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साधक के भीतर समर्पण, विनम्रता और श्रद्धा का भाव जागृत करने वाली साधना है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जीवन इच्छाओं, चिंताओं और भौतिक गतिविधियों में उलझा रहता है। ऐसे में गुरु का सान्निध्य उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाने में सहायक होता है।

उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा और उनके मार्गदर्शन में की गई सेवा साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनती है। सेवा के माध्यम से व्यक्ति स्वार्थ और अहंकार से ऊपर उठकर समाज तथा मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझने लगता है। सच्ची गुरु सेवा वही है, जिसमें साधक तन, मन और कर्म से समर्पित होकर गुरु की शिक्षाओं को अपने जीवन में धारण करे।स्वामी विज्ञानानंद जी ने श्रद्धालुओं से नियमित रूप से सत्संग, साधना और सेवा से जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि गुरु द्वारा बताए गए मार्ग पर चलते हुए किया गया प्रत्येक सत्कर्म व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास का माध्यम बन सकता है।

कार्यक्रम के अंत में स्वामी हरिशानंद ने मंच संचालन करते हुए उपस्थित श्रद्धालुओं को ध्यान साधना के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि बाहरी संसार की भागदौड़ के बीच मनुष्य को वास्तविक शांति तभी प्राप्त होती है, जब वह कुछ समय अपने भीतर की ओर लगाए। इसके बाद श्रद्धालुओं ने ध्यान साधना में सहभागिता की और आध्यात्मिक शांति का अनुभव किया।कार्यक्रम के उपरांत सभी श्रद्धालुओं के लिए भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें संगत ने प्रसाद

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