1 राजधानी में सुरक्षित भविष्य का सपना लेकर आए बच्चों की मौत ने व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल
2 पीजी और छात्रावासों की सुरक्षा, अवैध निर्माण और प्रशासनिक निगरानी पर उठे सवाल
3 जिम्मेदारी तय हो, दोषियों पर कार्रवाई हो—तभी हादसे में जान गंवाने वालों को मिलेगा सच्चा न्याय

जरा कल्पना कीजिए उस मां-बाप की, जो अपने बच्चे को घर से दूर किसी बड़े शहर में पढ़ने के लिए भेजते हैं। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बच्चे को दिल्ली, कोटा, प्रयागराज या किसी दूसरे शहर में पढ़ाना केवल शिक्षा का फैसला नहीं होता, बल्कि यह वर्षों की मेहनत, बचत और उम्मीदों का निवेश होता है। कई परिवार बच्चों की फीस, कोचिंग, हॉस्टल और रोजमर्रा के खर्च जुटाने के लिए अपनी जरूरतें तक टाल देते हैं। कोई बैंक से कर्ज लेता है, कोई रिश्तेदारों से उधार मांगता है और कोई अपनी जमा पूंजी तक निकाल देता है। मां अपने बेटे या बेटी को विदा करते समय यही सपना देखती है कि उसका बच्चा पढ़-लिखकर काबिल बनेगा, नौकरी करेगा और एक दिन गर्व से कहेगा—“मां, अब आपको किसी चीज की चिंता नहीं करनी।” लेकिन जब उसी बच्चे की खबर सफलता के बजाय हादसे में मौत के रूप में घर पहुंचती है, तो उस परिवार पर क्या गुजरती होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत के गिरने से सात लोगों की मौत ने इसी दर्दनाक सवाल को पूरे देश के सामने खड़ा कर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार मृतकों में छात्र भी शामिल थे।
सत्य निकेतन की घटना सिर्फ एक इमारत गिरने की खबर नहीं है। यह उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है, जिसमें देश की राजधानी में पढ़ने आने वाले छात्रों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? शुरुआती रिपोर्टों में इमारत में मरम्मत और बेसमेंट में निर्माण कार्य की बात सामने आई है। हादसे के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया, पीजी संचालकों के खिलाफ कार्रवाई हुई और नगर निगम के अधिकारियों पर भी कार्रवाई की खबर सामने आई। पांच एमसीडी अधिकारियों को निलंबित किए जाने तथा पीजी इमारतों के स्ट्रक्चरल ऑडिट की बात सामने आई है। सवाल यह है कि अगर कोई इमारत पहले से जोखिम में थी, अगर वहां निर्माण या बदलाव का काम चल रहा था, तो संबंधित विभागों की निगरानी कहां थी? क्या निरीक्षण केवल हादसे के बाद ही होना था? दिल्ली जैसे महानगर में हजारों छात्र निजी पीजी और किराये के मकानों में रहते हैं। ऐसे में छात्र आवासों की सुरक्षा केवल मकान मालिक की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। नगर निकाय, प्रशासन, विश्वविद्यालय और संबंधित नियामक संस्थाओं को भी अपनी जवाबदेही तय करनी होगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी मामले में एमसीडी और दिल्ली विश्वविद्यालय की भूमिका पर सवाल उठाए हैं।
इस घटना को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करना भी उचित नहीं होगा। सत्ता चाहे किसी दल की हो, छात्रों की सुरक्षा राजनीति से ऊपर होनी चाहिए। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में भवन गिरने की समस्या कोई नई नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार 2022 से 2024 के बीच दिल्ली में इमारत गिरने की 1,133 घटनाएं सामने आईं और इनमें 98 लोगों की मौत हुई। ये आंकड़े अपने आप में चेतावनी हैं कि भवन सुरक्षा, अवैध निर्माण, कमजोर संरचनाओं और समय पर निरीक्षण को लेकर गंभीर व्यवस्था की जरूरत है। इसलिए सत्य निकेतन हादसे पर यह सवाल पूछना जरूरी है कि क्या केवल कुछ अधिकारियों के निलंबन या कुछ लोगों की गिरफ्तारी से समस्या खत्म हो जाएगी? जरूरत इससे कहीं आगे जाने की है। दिल्ली में छात्र पीजी और हॉस्टलों का अनिवार्य पंजीकरण, नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट, फायर सेफ्टी जांच, स्वीकृत नक्शे की जांच और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कड़ी कार्रवाई जरूरी है। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें किसी छात्र को कम किराये के नाम पर असुरक्षित इमारत में रहने के लिए मजबूर न होना पड़े। हादसे के बाद दिल्ली सरकार द्वारा अवैध निर्माणों पर कार्रवाई और पीजी सुरक्षा की जांच के निर्देश दिए जाने की रिपोर्ट है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि ये कदम कितनी गंभीरता और निरंतरता से लागू होते हैं।
सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—अगर सत्य निकेतन के मलबे में दबा छात्र आपका अपना बेटा होता, आपकी अपनी बेटी होती, तो आप जिम्मेदारी किसकी तय करते? जिस बच्चे को मां ने हजारों सपनों के साथ घर से विदा किया था, उसके शव को कंधा देना किसी भी परिवार के लिए जीवन का सबसे बड़ा दुःख है। इसलिए इस घटना को केवल एक “हादसा” कहकर भूल जाना उन परिवारों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली भेजा था। लेकिन जिम्मेदारी तय करने के लिए आरोप नहीं, निष्पक्ष जांच और ठोस सबूत जरूरी हैं। दोष चाहे भवन मालिक का हो, निर्माण में लापरवाही का हो, निगरानी करने वाले अधिकारियों का हो या नियमों के उल्लंघन का—जिसकी भी भूमिका सामने आए, उसके खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही मृतकों के परिवारों को उचित मुआवजा, घायलों को बेहतर उपचार और दिल्ली में छात्र आवासों की सुरक्षा की स्थायी व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। सत्य निकेतन का मलबा हट जाएगा, सड़क फिर बन जाएगी और कुछ समय बाद शायद लोगों की स्मृति से यह घटना भी धुंधली पड़ जाए; लेकिन जिन घरों में उस दिन का इंतजार हमेशा के लिए खत्म हो गया, वहां यह दर्द कभी खत्म नहीं होगा। इन बच्चों की मौत का सबसे बड़ा सबक यही है कि विकास की चमक के पीछे नागरिकों, खासकर छात्रों की सुरक्षा को कभी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

