भारत में करोड़ों लोगों की सेहत से खिलवाड़ कोई मामूली अपराध नहीं है। सवाल यह है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़े विभाग आखिर कब तक शुतुरमुर्ग की मुद्रा में पड़े रहेंगे? त्योहार आते ही कुछ जगह छापेमारी, कुछ नमूने जब्त, कुछ कार्रवाई और फिर वही पुरानी सुप्तावस्था—क्या यही खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की पहचान बन गई है?
आज उपभोक्ता के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह आखिर भरोसा करे तो किस पर करे? बाजार में पनीर से लेकर दूध, मिठाइयों, चावल, मसालों, ड्राई फ्रूट्स, सब्जियों, पैकेज्ड ड्रिंक, जूस, चॉकलेट और बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। समस्या केवल मिलावट की नहीं, बल्कि नकली, घटिया और गलत लेबल वाले उत्पादों की भी है।
त्योहारों के समय विभाग सक्रिय दिखाई देता है। कैमरे के सामने छापेमारी होती है, सैंपल लिए जाते हैं और कार्रवाई के दावे किए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि मिलावटखोरी केवल त्योहारों के मौसम में ही क्यों होती है? क्या मिलावट करने वाले साल के बाकी 11 महीने कारोबार बंद कर देते हैं?
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि यदि खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की नियमित निगरानी की व्यवस्था है, तो बाजार में संदिग्ध और मिलावटी उत्पाद लगातार पहुंचते कैसे हैं? यदि विभाग के पास जांच की शक्तियां हैं, तो कार्रवाई निरंतर क्यों नहीं होती? और यदि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कानून मौजूद है, तो उसका भय बाजार में दिखाई क्यों नहीं देता?
यह केवल उपभोक्ता के पैसे की लूट नहीं है। नकली या असुरक्षित खाद्य पदार्थ सीधे मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। बच्चों के मामले में तो जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि उनके भोजन में मिलावट का असर लंबे समय तक पड़ सकता है।
यक्ष प्रश्न यही है—इतना नरम रवैया क्यों?
सरकारें और राजनीतिक दल जनता के हितों की बात करते हैं। चुनावों में स्वास्थ्य, शिक्षा और जनकल्याण बड़े मुद्दे बनते हैं। लेकिन जिस भोजन को जनता प्रतिदिन अपने परिवार और बच्चों को खिला रही है, उसकी शुद्धता राजनीतिक प्राथमिकता में उतनी मजबूती से क्यों दिखाई नहीं देती?
राजनीतिक दल अपनी राजनीति चमकाने के लिए जिस ऊर्जा और संसाधन का इस्तेमाल करते हैं, उसका कुछ हिस्सा यदि जनता की थाली सुरक्षित करने, खाद्य निरीक्षण व्यवस्था मजबूत करने और मिलावटखोरों पर निरंतर कार्रवाई में लगाया जाए, तो इसका सीधा लाभ आम आदमी को मिलेगा।
जरूरत त्योहारों पर दिखावटी छापेमारी की नहीं, बल्कि 365 दिन चलने वाली वैज्ञानिक, पारदर्शी और जवाबदेह खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की है।
जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसकी थाली में जो दूध है, वह दूध है या नहीं; जो पनीर है, वह पनीर है या नहीं; जो मिठाई है, उसमें क्या मिला है; और बच्चों को दिया जा रहा खाद्य पदार्थ वास्तव में सुरक्षित है या नहीं।
सरकारों को यह तय करना होगा कि खाद्य सुरक्षा केवल फाइलों और त्योहारों की छापेमारी तक सीमित रहेगी या वास्तव में इसे जनस्वास्थ्य का सर्वोच्च मुद्दा बनाया जाएगा।
क्योंकि राजनीति पांच साल के लिए होती है, लेकिन गलत भोजन का असर इंसान की पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है।

