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हिमाचल का भूगोल वरदान भी, चुनौती भी: पहाड़ों की कीमत पर विकास कब तक?

RamParkash Vats
9 Min Read

पहाड़ कमजोर हुए तो हिमाचल की नींव हिलेगी

पहाड़ बचेंगे तो जंगल बचेंगे।जंगल बचेंगे तो जलस्रोत बचेंगे।
जलस्रोत बचेंगे तो जीवन बचेगा।और जीवन बचेगा तभी हिमाचल का भविष्य बचेगा।क्या हमारी विकास नीति पहाड़ों की आवाज सुन रही है?
यदि नहीं, तो समय आ गया है कि सरकार, प्रशासन, विशेषज्ञ और समाज मिलकर इस पर गंभीरता से विचार करें।

प्रकृति को चुनौती देना विकास नहीं है।प्रकृति की सीमाओं को समझकर उसके साथ आगे बढ़ना ही वास्तविक विकास है।हिमाचल प्रदेश के लिए पहाड़ केवल पहचान नहीं हैं, यही उसकी अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और जीवन का आधार हैं। हिमालय की गोद में बसे इस प्रदेश को प्रकृति ने जंगल, नदियां, जलस्रोत, ग्लेशियर, जैव विविधता, पर्यटन और जलविद्युत जैसी अमूल्य संपदा दी है। लेकिन यही भौगोलिक संरचना हिमाचल को अत्यंत संवेदनशील भी बनाती है।आज हिमाचल के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि विकास की हमारी परिभाषा क्या है और क्या वह हिमाचल के भूगोल के अनुरूप है?सड़कें बनें, पुल बनें, सुरंगें बनें, पर्यटन विकसित हो, रोजगार के अवसर बढ़ें—इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। समस्या तब शुरू होती है जब विकास के नाम पर पहाड़ की प्राकृतिक संरचना को ही कमजोर कर दिया जाए। पहाड़ को काटकर सड़क बना देना विकास का अंतिम प्रमाण नहीं हो सकता। यदि उसी कटिंग के कारण बरसात में भूस्खलन हो, सड़क धंस जाए, जलधाराएं अवरुद्ध हों और नीचे बसे गांव खतरे में पड़ जाएं, तो उस विकास की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?यह सवाल अब केवल पर्यावरणविदों का नहीं, बल्कि सरकार, प्रशासन, इंजीनियरिंग व्यवस्था और समाज—सभी के सामने है।प्रकृति को दोष देकर जिम्मेदारी से नहीं बचा जा सकता:हर मानसून में हिमाचल भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़ और सड़क धंसने जैसी घटनाओं से जूझता है। निश्चित रूप से हिमालय प्राकृतिक रूप से संवेदनशील है और अत्यधिक वर्षा जैसी घटनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। लेकिन क्या हर नुकसान को केवल “प्राकृतिक आपदा” कहकर हम अपनी जिम्मेदारी समाप्त कर सकते हैं?यदि किसी पहाड़ की ढलान को जरूरत से ज्यादा काटा गया, यदि जल निकासी की उचित व्यवस्था नहीं की गई, यदि प्राकृतिक नाले के रास्ते में निर्माण कर दिया गया या संवेदनशील क्षेत्र में बिना पर्याप्त भू-वैज्ञानिक अध्ययन के परियोजना खड़ी कर दी गई, तो आपदा का पूरा दोष प्रकृति पर डालना सुविधाजनक जरूर है, लेकिन ईमानदार नहीं।प्रकृति आपदा पैदा कर सकती है, लेकिन हमारी गलतियां उसके प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकती हैं।यही वह बिंदु है जहां हिमाचल की विकास नीति पर गंभीर आत्ममंथन आवश्यक है।पहाड़ सड़क का कच्चा माल नहीं:सड़क निर्माण हिमाचल की आवश्यकता है। दुर्गम क्षेत्रों को जोड़ना सरकार की जिम्मेदारी भी है। लेकिन सड़क निर्माण का मतलब पहाड़ को जितना चाहें उतना काट देना नहीं हो सकता।हर कटिंग के साथ ढलान की स्थिरता, जल निकासी, रिटेनिंग संरचना और हरित पुनर्स्थापन की योजना होनी चाहिए। निर्माण एजेंसियों को यह समझना होगा कि पहाड़ मैदानी क्षेत्र की तरह व्यवहार नहीं करते। यहां एक छोटी इंजीनियरिंग गलती भी बरसात में बड़े संकट में बदल सकती है।इसी तरह सुरंगों और बड़ी परियोजनाओं के मामले में भूगर्भीय संरचना, भूमिगत जलधाराओं और आसपास की बस्तियों पर संभावित प्रभाव का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। विकास की जल्दबाजी में यदि विज्ञान को पीछे कर दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां उसकी कीमत चुकाएंगी।जंगल कटे तो सिर्फ पेड़ नहीं जाते:हिमाचल के जंगल उसकी प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था हैं। जंगल मिट्टी को बांधते हैं, जलस्रोतों को recharge करते हैं, वर्षा के पानी को नियंत्रित करते हैं और ढलानों की स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।इसलिए किसी वन क्षेत्र में पेड़ काटकर बाद में कहीं दूसरी जगह पौधे लगा देना पर्यावरणीय संतुलन की पूरी भरपाई नहीं है। एक दशकों पुराने प्राकृतिक जंगल और नए लगाए गए पौधों के बीच पारिस्थितिक दृष्टि से कोई सरल समानता नहीं हो सकती।हिमाचल में विकास परियोजनाओं के नाम पर वन और प्राकृतिक जलस्रोतों पर बढ़ते दबाव को केवल आंकड़ों के माध्यम से नहीं देखा जा सकता। सवाल यह है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या बचाकर रख रहे हैं?खनन का राजस्व या भविष्य का नुकसान-खनन से सरकार को राजस्व मिल सकता है। स्थानीय स्तर पर रोजगार भी पैदा हो सकता है। लेकिन यदि खनन किसी पहाड़ी ढलान को अस्थिर करता है, जलधारा को प्रभावित करता है या कृषि भूमि को नुकसान पहुंचाता है तो तत्काल मिलने वाला राजस्व भविष्य के नुकसान के सामने बेहद छोटा हो सकता है।सरकार को यह तय करना होगा कि राजस्व बढ़ाना महत्वपूर्ण है या प्राकृतिक पूंजी को सुरक्षित रखना। सही नीति दोनों के बीच संतुलन बनाएगी, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों में प्राकृतिक सुरक्षा से समझौता करके कमाया गया राजस्व दीर्घकाल में घाटे का सौदा साबित हो सकता है।पहाड़ों पर मैदानी विकास मॉडल क्यों? :शिमला, धर्मशाला, मनाली और प्रदेश के अन्य तेजी से विकसित होते शहरों में शहरीकरण एक बड़ी चुनौती बन चुका है। पहाड़ी शहरों की भौगोलिक क्षमता सीमित है। वहां सड़क, पार्किंग, भवन, पानी, सीवरेज और कचरा प्रबंधन की अपनी सीमाएं हैं।इसके बावजूद यदि मैदानी शहरों की तर्ज पर लगातार बहुमंजिला निर्माण और अनियंत्रित विस्तार होता रहा, तो शहर अपनी ही भौगोलिक क्षमता के बोझ तले दब सकते हैं।पहाड़ों पर विकास की नकल नहीं, पहाड़ों के अनुरूप विकास चाहिए।सबसे बड़ा संकट—आपदा के बाद जागना:हिमाचल की व्यवस्था में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हम अक्सर आपदा आने के बाद सक्रिय होते हैं। हादसा हुआ, निरीक्षण हुआ, राहत मिली, बैठक हुई, समिति बनी और रिपोर्ट तैयार हुई। कुछ समय बाद सब शांत हो जाता है।फिर अगली बरसात में वही समस्या सामने आ जाती है।ही वह चक्र है जिसे तोड़ना होगायदि किसी वैज्ञानिक अध्ययन ने पहले ही किसी क्षेत्र को संवेदनशील बताया है और फिर भी वहां निर्माण की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में होने वाली क्षति को केवल प्राकृतिक आपदा कहकर जिम्मेदारी से बचना उचित नहीं होगा। जहां जोखिम की जानकारी पहले से मौजूद हो, वहां लापरवाही भी आपदा का एक कारण बन जाती है।अब चाहिए ‘वहन क्षमता’ पर आधारित विकास:हिमाचल को अब स्पष्ट भौगोलिक वहन क्षमता नीति की जरूरत है। प्रत्येक क्षेत्र की यह वैज्ञानिक रूप से पहचान होनी चाहिए कि वहां कितना निर्माण, कितनी सड़क, कितना पर्यटन और कितनी आबादी पर्यावरणीय एवं भूगर्भीय दृष्टि से सुरक्षित है।संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक मैपिंग हो। बड़े निर्माण से पहले भू-वैज्ञानिक और जल निकासी अध्ययन अनिवार्य हों। सड़क, सुरंग, जलविद्युत और शहरी परियोजनाओं की स्वतंत्र वैज्ञानिक निगरानी हो। नियमों के उल्लंघन पर केवल ठेकेदार को दोषी ठहराने की परंपरा खत्म हो और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो।सबसे जरूरी यह कि पर्यावरणीय नियम फाइलों में नहीं, जमीन पर दिखाई दें।विकास रोकना नहीं, विकास की दिशा बदलना है:हिमाचल को विकास से पीछे हटने की जरूरत नहीं है। जरूरत है विकास की सोच बदलने की। विकास चाहिए जिसमें सड़क भी बने और पहाड़ भी सुरक्षित रहे। पर्यटन भी बढ़े और जलस्रोत भी जीवित रहें। सुरंग भी बने और भूगर्भीय जोखिम का वैज्ञानिक आकलन भी हो। शहर भी विकसित हों और उनकी वहन क्षमता का सम्मान भी किया जाए।हमें यह तय करना होगा कि आज की सुविधा के लिए हम कल का हिमाचल गिरवी नहीं रख सकते।क्योंकि जब पहाड़ कमजोर होंगे तो केवल सड़कें नहीं टूटेंगी। केवल मकान नहीं गिरेंगे। जलस्रोत प्रभावित होंगे, खेती प्रभावित होगी, पर्यटन प्रभावित होगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी और अंततः हिमाचल की सामाजिक एवं आर्थिक नींव कमजोर होगी।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—

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