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स्मार्टफोन आया और हर कोई पत्रकार बन बैठाआज के दौर में मोबाइल जितना वरदान, उतना ही अभिशाप भी

RamParkash Vats
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स्मार्टफोन आया और हर कोई पत्रकार बन बैठा

आज के दौर में मोबाइल जितना वरदान, उतना ही अभिशाप भी

लेखक: कपिल शर्मा

आज सूचना और तकनीक का युग है। स्मार्टफोन ने दुनिया को हमारी हथेली में समेट दिया है। गांव की चौपाल से लेकर महानगरों के दफ्तरों तक, इंटरनेट ने संवाद और सूचना की दूरी लगभग समाप्त कर दी है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, सरकारी सेवाएं, रोजगार, खेती-बाड़ी और आपदा के समय त्वरित सूचना—हर क्षेत्र में मोबाइल तकनीक ने जीवन को आसान और तेज बनाया है।

लेकिन हर वरदान के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। दुर्भाग्य से स्मार्टफोन के बढ़ते इस्तेमाल के साथ एक ऐसी प्रवृत्ति भी तेजी से सामने आई है, जिसने पत्रकारिता जैसे गंभीर और जिम्मेदार पेशे की गरिमा पर सवाल खड़े किए हैं। आज मोबाइल कैमरा और सोशल मीडिया अकाउंट हाथ में आते ही कुछ लोग स्वयं को पत्रकार समझने लगे हैं

लेकिन क्या मोबाइल फोन पत्रकारिता है? क्या किसी घटना की तस्वीर खींच लेना ही पत्रकार होने की पहचान है? क्या सबसे पहले पोस्ट कर देना ही खबर की सफलता है?

इन सवालों का जवाब निश्चित रूप से ‘नहीं’ है।

पत्रकारिता केवल खबर को सबसे पहले पहुंचाने की दौड़ नहीं, बल्कि सही खबर को जिम्मेदारी के साथ समाज तक पहुंचाने का धर्म है। पत्रकारिता में तथ्य होते हैं, लेकिन केवल तथ्य ही नहीं होते; उसमें संवेदना, विवेक, सत्यापन, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय दृष्टिकोण भी होता है।

एक जिम्मेदार पत्रकार खबर लिखने या प्रसारित करने से पहले कई सवालों के जवाब तलाशता है। सूचना कहां से आई? क्या इसकी पुष्टि हुई है? संबंधित पक्ष का क्या कहना है? क्या परिवार को घटना की जानकारी मिल चुकी है? क्या खबर प्रकाशित करने से किसी व्यक्ति की गरिमा, निजता या भावनाओं को अनावश्यक चोट पहुंचेगी?

यहीं से पत्रकारिता और सोशल मीडिया की जल्दबाजी के बीच अंतर स्पष्ट होता है।

आज कई बार सड़क दुर्घटना, मृत्यु, अपराध या किसी अन्य त्रासदी की खबर परिजनों तक पहुंचने से पहले ही सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है। कल्पना कीजिए उस परिवार की स्थिति, जिसे अभी तक अपने प्रियजन के बारे में आधिकारिक सूचना भी नहीं मिली और अचानक उसके मोबाइल पर उसकी मौत की खबर सामने आ जाए।

उस क्षण परिवार पर क्या गुजरती होगी, इसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं।

एक परिवार के लिए किसी अपने की मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा दुख हो सकती है, लेकिन किसी के लिए वही घटना कुछ मिनट पहले पोस्ट करने की ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बन जाए—इससे अधिक संवेदनहीन स्थिति और क्या हो सकती है?

यहीं हमें रुककर सोचना होगा।

आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—लाइक, व्यूज, फॉलोअर्स और वायरल होने की मानसिकता। खबर की सच्चाई से ज्यादा महत्वपूर्ण यह समझा जाने लगा है कि खबर सबसे पहले किसने डाली। नतीजा यह है कि अधूरी जानकारी, पुरानी तस्वीरें, पुराने वीडियो और अपुष्ट दावे कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच जाते हैं।

बाद में यदि खबर गलत साबित होती है तो पोस्ट डिलीट कर दी जाती है। लेकिन सवाल यह है कि गलत खबर से जिस व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई, जिस परिवार को मानसिक पीड़ा हुई या जिसके सामाजिक जीवन पर असर पड़ा, उसकी भरपाई कौन करेगा?

डिलीट किया गया पोस्ट, डिलीट हुई पीड़ा को वापस नहीं ला सकता।

यह समझना जरूरी है कि स्मार्टफोन पत्रकारिता का माध्यम हो सकता है, लेकिन स्वयं पत्रकारिता नहीं है। जिस प्रकार हाथ में कैमरा आ जाने से कोई डॉक्टर या वकील नहीं बन जाता, उसी प्रकार मोबाइल और फेसबुक अकाउंट होने मात्र से कोई पत्रकार नहीं बन जाता।

पत्रकारिता के लिए प्रशिक्षण चाहिए, तथ्यों की जांच की समझ चाहिए, भाषा और कानून की जानकारी चाहिए, समाज के प्रति जिम्मेदारी चाहिए और सबसे बढ़करविवेक और संवेदनशीलता चाहिए।

हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आज आम नागरिक भी सूचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। किसी सड़क हादसे, आगजनी, प्राकृतिक आपदा या किसी जनसमस्या की पहली तस्वीर और सूचना कई बार आम व्यक्ति के मोबाइल से ही सामने आती है। ऐसी नागरिक सूचनाएं प्रशासन और पेशेवर मीडिया के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं।

इसलिए सवाल नागरिक पत्रकारिता के अस्तित्व का नहीं, बल्कि उसकी जिम्मेदारी का है।

किसी दुर्घटना, मृत्यु, आत्महत्या, अपराध या पारिवारिक त्रासदी से जुड़ी जानकारी सामने आए तो उसे साझा करने से पहले कुछ क्षण ठहरना चाहिए। सबसे पहले तथ्य की पुष्टि हो, संबंधित परिवार को सूचना मिल चुकी हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि हमारी खबर किसी दुखी परिवार के जख्मों पर नमक न बन जाए।

कुछ मिनट की देरी खबर को कमजोर नहीं करती, लेकिन कुछ मिनट की जल्दबाजी किसी परिवार को जीवनभर का दर्द दे सकती है।

आज हमें तय करना होगा कि हमारा उद्देश्य समाज को सूचना देना है या केवल वायरल होना। यदि हर आंसू को कंटेंट, हर दुर्घटना को सनसनी और हर मौत को ‘ब्रेकिंग’ बना दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल जरूर पूछेंगी कि तकनीक के इस युग में हमने इंसानियत को कहां छोड़ दिया?

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को जागरूक करना है, भय पैदा करना नहीं; सच सामने लाना है, सनसनी फैलाना नहीं; पीड़ित की आवाज बनना है, उसके दर्द को तमाशा बनाना नहीं।

सलिए अगली बार जब कोई खबर आपके मोबाइल की स्क्रीन पर आए और आप उसे तुरंत आगे बढ़ाने के लिए उत्साहित हों, तो बस एक सवाल स्वयं से पूछिए—

“क्या यह खबर सच है? क्या इसकी पुष्टि हो चुकी है? और क्या इसे अभी साझा करना मानवीय रूप से उचित है?”

यदि जवाब स्पष्ट नहीं है, तो कुछ देर रुक जाइए।

क्योंकि पत्रकारिता की असली दौड़ सबसे पहले खबर पहुंचाने की नहीं, बल्कि सबसे पहले सही, सत्य और संवेदनशील खबर पहुंचाने की है।

स्मार्टफोन हमारे हाथ में है, लेकिन उसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी भी हमारे हाथ में ही है।
तकनीक को ताकत बनाइए, संवेदनहीनता का हथियार नहीं।

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