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संपादकीय: पौंग बांध विस्थापितों के मुरब्बों पर मंडराता संकट—क्या अब होगी निष्पक्ष अंतरराज्यीय जांच……?

RamParkash Vats
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संपादकीय चिंतन मंथन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश वत्स

पौंग बांध विस्थापितों का संघर्ष केवल पुनर्वास का इतिहास नहीं है, बल्कि यह दशकों से न्याय, सम्मान और अपने अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक भी है। हजारों परिवारों ने हिमाचल प्रदेश की अपनी पैतृक जमीनें देशहित में बने बांध के लिए छोड़ीं। बदले में राजस्थान में मुरब्बों के रूप में पुनर्वास का वादा किया गया। लेकिन समय के साथ अनेक शिकायतें सामने आती रही हैं कि कुछ विस्थापितों को उनकी जमीनों से वंचित करने के लिए कथित तौर पर सुनियोजित तरीके अपनाए गए। यदि इन शिकायतों में सच्चाई है, तो यह केवल भूमि विवाद नहीं, बल्कि पुनर्वास व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न है।

हाल के सामने आए प्रकरणों ने इस पूरे मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कुछ मामलों में कथित रूप से फर्जी मालिक तैयार किए गए, उनके नाम से फर्जी पहचान संबंधी दस्तावेज बनाकर पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार की गई और उसके आधार पर भूमि का विक्रय कर दिया गया। यदि किसी मामले में जांच के बाद ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह सामान्य धोखाधड़ी नहीं बल्कि सुनियोजित दस्तावेजी अपराध होगा, जिसने वास्तविक मालिकों के अधिकारों पर सीधा प्रहार किया है।

सबसे अधिक चिंता उन निर्धन, वृद्ध, अशिक्षित, आर्थिक रूप से कमजोर अथवा शारीरिक रूप से असक्षम पौंग बांध विस्थापितों की है, जो वर्षों तक राजस्थान जाकर अपने मुरब्बों की देखभाल नहीं कर सके। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि किसी सक्षम और जागरूक व्यक्ति के साथ भी ऐसी कथित धोखाधड़ी संभव है, तो उन कमजोर परिवारों की स्थिति क्या रही होगी, जिनके पास न पर्याप्त संसाधन थे और न ही लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने की क्षमता।

दुखद तथ्य यह भी सामने आता रहा है कि राजस्थान में मुरब्बों से जुड़े विवादों के कारण कुछ पौंग बांध विस्थापित अपनी जान तक गंवा चुके हैं। ऐसे घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे पुनर्वास तंत्र की संवेदनशीलता पर प्रश्न खड़े करते हैं। जब पुनर्वास का उद्देश्य सुरक्षित भविष्य देना था, तब यदि वही भूमि विवाद, धोखाधड़ी और संघर्ष का कारण बन जाए, तो यह व्यवस्था के लिए आत्ममंथन का विषय है।

राजस्थान में आज भी अनेक ईमानदार और जागरूक पौंग बांध विस्थापित अपने मुरब्बों पर रहकर खेती कर रहे हैं। वहीं अनेक परिवारों ने दूरी और परिस्थितियों के कारण भरोसेमंद व्यक्तियों को देखरेख की जिम्मेदारी सौंप रखी है। लेकिन शिकायतें यह भी रही हैं कि कुछ मामलों में इसी भरोसे का कथित दुरुपयोग हुआ और भूमि के वास्तविक मालिकों को भनक तक नहीं लगी। बाद में जब वास्तविक मालिक को जानकारी मिली, तब तक स्थिति इतनी जटिल हो चुकी थी कि न्याय प्राप्त करना अत्यंत कठिन हो गया।

आज सबसे बड़ा प्रश्न किसी एक मामले का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता का है। यदि एक भी मामला ऐसा है जिसमें वास्तविक मालिक की जानकारी के बिना उसकी भूमि का हस्तांतरण हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच अनिवार्य है। यदि ऐसे अनेक मामले हैं, तो यह और भी गंभीर विषय बन जाता है।

यही कारण है कि कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर अब सार्वजनिक रूप से सामने आने चाहिए—

1  आखिर कितने पौंग बांध विस्थापितों की भूमि बिना उनकी जानकारी के कथित रूप से हस्तांतरित या बेची गई?

2   कितने वास्तविक मालिक अपनी भूमि वापस प्राप्त करने में सफल हुए?

3   से मामलों में अब तक कितनी एफआईआर दर्ज हुईं, कितनी जांच पूरी हुई और कितने दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई?

4  कथित रूप से फर्जी पावर ऑफ अटॉर्नी तैयार करने वाले नेटवर्क पर क्या कार्रवाई हुई?

5   यह कथित खेल कब से चल रहा है और इसके पीछे कौन-कौन लोग शामिल रहे?

6   क्या हिमाचल प्रदेश के विभिन्न तहसील कार्यालयों में बनी पावर ऑफ अटॉर्नी का व्यापक सत्यापन कराया गया है?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल पीड़ित परिवारों के लिए ही नहीं, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए भी आवश्यक है।

यदि हिमाचल प्रदेश सरकार और राजस्थान सरकार संयुक्त रूप से उच्चस्तरीय अंतरराज्यीय जांच कराएं, तो वर्षों से लंबित अनेक शिकायतों की सच्चाई सामने आ सकती है। जिन मामलों में कथित रूप से फर्जी पहचान का उपयोग हुआ है, वहां संबंधित व्यक्ति, दस्तावेज, गवाह और पूरी दस्तावेजी श्रृंखला की वैज्ञानिक जांच कराई जानी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं को फर्जी मालिक के रूप में प्रस्तुत किया है, तो उसकी भूमिका की गहन जांच पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।

यह भी समय की मांग है कि पौंग बांध विस्थापितों की राजस्थान स्थित भूमि का एक आधुनिक, डिजिटल और पारदर्शी सत्यापन अभियान चलाया जाए, ताकि वास्तविक मालिकों के अधिकार सुरक्षित रहें और भविष्य में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी की संभावना न्यूनतम हो।

पौंग बांध विस्थापितों ने देशहित में अपना सर्वस्व त्यागा था। इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा केवल प्रशासनिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। यदि कहीं भी धोखाधड़ी हुई है तो दोषियों को कानून के दायरे में लाना आवश्यक है, और यदि शिकायतें निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच के माध्यम से यह भी स्पष्ट होना चाहिए।

यह विषय किसी राजनीतिक लाभ या हानि का नहीं, बल्कि उन हजारों विस्थापित परिवारों के विश्वास का है जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए अपना घर-बार छोड़ा था। अब समय आ गया है कि सरकारें, जांच एजेंसियां और न्याय व्यवस्था मिलकर इस यक्ष प्रश्न का उत्तर दें—क्या पौंग बांध विस्थापितों को उनके अधिकारों का वास्तविक न्याय मिलेगा, या उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों तक इसी तरह चलता रहेगा?

(हिमाचल प्रदेश जिला कांगड़ा के उपमंडल ज्वाली के अंतर्गत पंचायत भरमाड़ की घटना है जिसमें पीड़ित शिकायतकर्ता पौंग बांध विस्थापित पंडित जगदीश चंद शर्मा 86 ने कहा है कि पूरी प्रक्रिया इतनी सुनियोजित ढंग से की गई कि पहली नजर में किसी को संदेह होने की संभावना भी कम दिखाई देती है। यदि इन आरोपों की जांच में पुष्टि होती है, तो यह न केवल दस्तावेजी जालसाजी का गंभीर मामला होगा, बल्कि विस्थापित परिवारों के अधिकारों पर भी सीधा आघात माना जाएगा।)

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