एक समय था जब आवारा कुत्तों को केवल एक सामान्य शहरी समस्या माना जाता था, लेकिन आज स्थिति कई क्षेत्रों में गंभीर जनसुरक्षा संकट का रूप ले चुकी है।

आए दिन पागल (रेबीज़ संक्रमित) या आक्रामक कुत्तों द्वारा बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर हमले की खबरें सामने आ रही हैं। यह केवल पशु नियंत्रण का मुद्दा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य, प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक चेतना का प्रश्न बन चुका है।
सबसे अधिक खतरा छोटे बच्चों को है। स्कूल जाते समय, खेलते हुए या घर के बाहर निकलते ही वे इन कुत्तों के निशाने पर आ जाते हैं। एक बार रेबीज़ संक्रमित कुत्ते के काटने पर यदि समय पर उपचार न मिले, तो यह बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है। ऐसे में हर घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का आईना है।
प्रशासन की जिम्मेदारी केवल घटना के बाद मुआवजा देने या कुत्तों को पकड़ने तक सीमित नहीं हो सकती। नगर निकायों और पंचायतों को नियमित रूप से आवारा कुत्तों की गणना, नसबंदी, टीकाकरण और आक्रामक या संक्रमित कुत्तों को सुरक्षित तरीके से पकड़ने की प्रभावी व्यवस्था करनी होगी। स्वास्थ्य विभाग को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक सरकारी अस्पताल में एंटी-रेबीज़ वैक्सीन और इम्यूनोग्लोबुलिन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों।
समाज की भी अपनी जिम्मेदारी है। कूड़े के खुले ढेर आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोग यदि कचरे का सही निस्तारण करें और पशुओं को जिम्मेदारी से भोजन दें, तो समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो सकती है। वहीं, पशु प्रेम का अर्थ यह नहीं कि सार्वजनिक सुरक्षा की अनदेखी की जाए। पशु संरक्षण और मानव सुरक्षा—दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।
सरकार को इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए। पंचायतों, नगर परिषदों, पशुपालन विभाग, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस के बीच समन्वय स्थापित कर त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था बनानी होगी। साथ ही लोगों को रेबीज़ से बचाव, प्राथमिक उपचार और समय पर टीकाकरण के प्रति जागरूक करना भी उतना ही आवश्यक है।
यह विषय राजनीति का नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा का है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएँ और बढ़ सकती हैं। हर नागरिक को सुरक्षित वातावरण में जीने का अधिकार है, और यह अधिकार सुनिश्चित करना सरकार तथा प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
पागल कुत्तों का बढ़ता आतंक केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य आपातस्थिति का संकेत है। अब केवल चेतावनियों से काम नहीं चलेगा। आवश्यक है कि प्रशासन तत्काल प्रभावी कार्रवाई करे, सरकार दीर्घकालिक नीति बनाए और समाज भी अपनी जिम्मेदारी निभाए। तभी लोगों के मन से भय समाप्त होगा और मानव जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।

