
सिरमौर /नौहराधार,जिला चीफ़ ब्यूरो कपिल शर्मा
आस्था, श्रद्धा और हिमाचल की समृद्ध देव संस्कृति का अद्भुत संगम उस समय देखने को मिला जब श्री शिरगुल महाराज की ऐतिहासिक पवित्र जातर तीसरे वर्ष की परंपरा के तहत उनकी जन्मस्थली शाया से पवित्र चूड़धार धाम पहुंची। नौहराधार और शाया से निकली देव जातरें पारंपरिक रीति-रिवाजों, ढोल-नगाड़ों, रणसिंघों और श्रद्धालुओं के गगनभेदी जयकारों के बीच चूड़धार में एकत्रित हुईं।
सदियों से चली आ रही इस धार्मिक परंपरा के अनुसार प्रत्येक तीसरे वर्ष शाया और नौहराधार से निकलने वाली देव जातरें चूड़धार में मिलती हैं। इस ऐतिहासिक अवसर पर रेणुका, राजगढ़ और पच्छाद क्षेत्र के नौ परगनों से हजारों श्रद्धालु सुबह अपने-अपने गांवों से पैदल यात्रा पर निकले। दुर्गम पहाड़ी रास्तों और कठिन चढ़ाई के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था।
श्रद्धालुओं ने बंगा पाणी, वैरभ और तीसरी जैसे पड़ावों पर खुले आसमान के नीचे रात्रि विश्राम किया। रातभर जंगलों के बीच देव जागरण, भजन-कीर्तन और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की मधुर धुनों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
सुबह नौहराधार क्षेत्र से पहुंचे श्रद्धालुओं ने तीसरी नामक स्थान पर शाया से आई देव जातर का पारंपरिक रीति-रिवाजों और देव वाद्य यंत्रों के साथ भव्य स्वागत किया। इसके बाद सभी नौ परगनों की देव जातरें “जय श्री शिरगुल महाराज” के गगनभेदी जयकारों के साथ चूड़धार धाम के लिए रवाना हुईं।
चूड़धार पहुंचने पर श्री शिरगुल महाराज का विधि-विधान के अनुसार शाही स्नान कराया गया। इसके उपरांत मंदिर परिसर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। श्रद्धालुओं ने क्षेत्र की सुख-समृद्धि, उत्तम वर्षा, अच्छी फसल, शांति और जनकल्याण की कामना करते हुए महाराज का आशीर्वाद प्राप्त किया
धार्मिक अनुष्ठानों के बाद श्रद्धालु समुद्र तल से लगभग 12,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र शिवलिंग तक पहुंचे, जहां भगवान शिव का जलाभिषेक कर परिवार एवं प्रदेश की खुशहाली की मंगलकामना की गई।
श्री शिरगुल महाराज की यह ऐतिहासिक जातर न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि हिमाचल की प्राचीन लोक संस्कृति, देव परंपरा और सामाजिक एकता का भी जीवंत उदाहरण है। हर तीसरे वर्ष आयोजित होने वाली यह पवित्र यात्रा हजारों श्रद्धालुओं को अपनी संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने का कार्य करती है

