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✍️ संपादकीय—-टेट नहीं, नियम तय करेंगे पदोन्नति का रास्ता:अब सरकार के फैसले की बारी

RamParkash Vats
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सुप्रीम कोर्ट की स्पष्टता के बाद शिक्षकों की उम्मीदें बढ़ीं, क्या अब खुलेगा प्रमोशन का रास्ता?

क्योंकि मजबूत शिक्षा व्यवस्था केवल नई भर्तियों से नहीं, बल्कि योग्य और अनुभवी शिक्षकों को समय पर उचित पदोन्नति देने से भी बनती है।

हिमाचल प्रदेश में वर्षों से लंबित शिक्षकों की पदोन्नतियों का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार बहस का आधार शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) नहीं, बल्कि उसके संबंध में आए न्यायिक निर्णय की सही व्याख्या है। यदि वास्तव में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि टीईटी केवल उन्हीं पदों पर लागू होगी, जहां भर्ती एवं पदोन्नति नियम (आर एंड पी रूल्स) में इसे अनिवार्य योग्यता के रूप में अधिसूचित किया गया है, तो यह हजारों शिक्षकों के लिए बड़ी राहत का विषय हो सकता है।सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या न्यायालय का निर्णय स्वयं सेवा नियमों को बदल देता है? उत्तर स्पष्ट है—नहीं। न्यायालय कानून और नियमों की व्याख्या करता है, नए सेवा नियम नहीं बनाता। यदि किसी पद के आर एंड पी नियमों में टीईटी अनिवार्य नहीं है, तो केवल न्यायालय के निर्णय का हवाला देकर उसे नई अनिवार्यता के रूप में लागू नहीं किया जा सकता। ऐसा करने के लिए सरकार को विधिवत नियमों में संशोधन करना होगा।

यही कारण है कि राजकीय टीजीटी कला संघ ने सरकार से मांग की है कि 749 टीजीटी से प्रवक्ता, 600 टीजीटी से हेडमास्टर तथा 560 जेबीटी एवं सी एंड वी शिक्षकों को टीजीटी पदों पर पदोन्नति शीघ्र प्रदान की जाए। यह मांग केवल पदोन्नति की नहीं, बल्कि नियमों के अनुरूप न्याय की मांग है।हिमाचल के शिक्षा विभाग में लंबे समय से पदोन्नतियां लंबित रहने का सबसे बड़ा नुकसान विद्यार्थियों और शिक्षा व्यवस्था को उठाना पड़ता है। अनेक विद्यालय आज भी नियमित हेडमास्टर, प्रवक्ता और वरिष्ठ शिक्षकों के अभाव में चल रहे हैं। इसका सीधा असर शैक्षणिक गुणवत्ता, प्रशासनिक दक्षता और विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ता है।

सरकार के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस विषय पर किसी भी प्रकार का भ्रम समाप्त करे। यदि कानूनी स्थिति स्पष्ट है, तो शिक्षा विभाग को विधिक प्रकोष्ठ से विस्तृत स्पष्टीकरण जारी करना चाहिए ताकि भविष्य में अनावश्यक विवाद, न्यायालयी मुकदमे और प्रशासनिक असमंजस पैदा न हों।यह भी ध्यान रखना होगा कि सेवा में वर्षों का अनुभव रखने वाले शिक्षक अपनी पदोन्नति के लिए लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि नियमों में टीईटी अनिवार्य नहीं है, तो केवल आशंकाओं या गलत व्याख्याओं के आधार पर उनकी पदोन्नति रोकना न तो न्यायसंगत होगा और न ही प्रशासनिक दृष्टि से उचित।

सरकार को इस अवसर को केवल कानूनी विवाद के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के अवसर के रूप में देखना चाहिए। रिक्त पदों पर समयबद्ध पदोन्नतियां होने से विद्यालयों में नेतृत्व मजबूत होगा, शिक्षकों का मनोबल बढ़ेगा और विद्यार्थियों को भी बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिलेगा।हिमाचल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को आज सबसे अधिक आवश्यकता स्पष्ट नीति, पारदर्शी निर्णय और समयबद्ध कार्रवाई की है। यदि आर एंड पी नियमों में टीईटी अनिवार्य नहीं है, तो लंबित पदोन्नतियों को और विलंबित करने का कोई औचित्य नहीं बनता। न्यायालय के निर्णय की सही व्याख्या करते हुए सरकार को शीघ्र विधिक स्पष्टीकरण जारी करना चाहिए और वर्षों से प्रतीक्षारत शिक्षकों को उनका वैधानिक अधिकार प्रदान करना चाहिए।

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