संकेतिक चित्र

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक खबरों, फर्जी सूचनाओं और दुष्प्रचार पर अंकुश लगाने के लिए मंत्रिमंडलीय उप समिति की पहली बैठक बुलाना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया सूचना का सबसे तेज माध्यम बनकर उभरा है, लेकिन इसके साथ ही अफवाहों और बिना पुष्टि वाली खबरों का प्रसार भी तेजी से बढ़ा है।
मानसून आपदा के दौरान पुरानी वीडियो को नया बताकर प्रसारित करना, सरकारी योजनाओं और भर्तियों को लेकर गलत जानकारी फैलाना तथा लोगों में भ्रम और डर का माहौल पैदा करना निश्चित रूप से चिंता का विषय है। ऐसी गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई आवश्यक है।लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि फेक न्यूज़ के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित न हो।
लोकतंत्र में सरकार की आलोचना और सवाल पूछना नागरिकों तथा मीडिया का अधिकार है। कार्रवाई केवल उन लोगों पर होनी चाहिए जो जानबूझकर झूठी और भ्रामक जानकारी फैलाते हैं, न कि उन पत्रकारों या नागरिकों पर जो तथ्यों के आधार पर अपनी राय रखते हैं।
यदि सरकार वेब पोर्टलों और सोशल मीडिया समाचार चैनलों के लिए पंजीकरण व्यवस्था लागू करती है, तो उसके नियम स्पष्ट, पारदर्शी और सभी के लिए समान होने चाहिए। साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि किसी भी कार्रवाई में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो और किसी के साथ पक्षपात न हो।
खबरों पर रोक लगाना समय की आवश्यकता है, लेकिन यह पहल तभी सफल और लोकतांत्रिक मानी जाएगी जब इसके माध्यम से समाज में सत्य और जिम्मेदार पत्रकारिता को बढ़ावा मिले, न कि आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने का माध्यम बने। सरकार और मीडिया—दोनों की जिम्मेदारी है कि जनता तक केवल प्रमाणित और तथ्यात्मक जानकारी ही पहुंचे।

