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धारावाहिक(67)स्वतंत्रता संग्राम में अद्भुत साहसी योगदान : पिंगली वेंकैया और भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का गौरवशाली इतिहास

RamParkash Vats
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पिंगली वेंकैया द्वारा निर्मित राष्ट्रीय ध्वज)(भारत की स्वतंत्रता से ठीक पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने पिंगली वेंकैया के डिजाइन के आधार पर राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को रखा गया, जो न्याय, धर्म और प्रगति का प्रतीक है।
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल तलवार, सत्याग्रह और बलिदानों की कहानी ही नहीं है, बल्कि यह विचारों, प्रतीकों और राष्ट्रीय चेतना के निर्माण की भी गाथा है। इस महान संघर्ष में अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने साहस, त्याग और दूरदर्शिता से राष्ट्र को नई दिशा दी। उन्हीं महान विभूतियों में पिंगली वेंकैया का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। पिंगली वेंकैया (2 अगस्त 1876 – 4 जुलाई 1963) न केवल एक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि वे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के शिल्पकार भी थे। उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अद्भुत और ऐतिहासिक माना जाता है।

पिंगली वेंकैया आंध्र प्रदेश के निवासी थे और बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। वे गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे और भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में देखने का सपना संजोए हुए थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने महसूस किया कि एक राष्ट्र को एकजुट करने के लिए एक राष्ट्रीय ध्वज अत्यंत आवश्यक है। यही विचार उनके जीवन का लक्ष्य बन गया। उन्होंने अनेक वर्षों तक ध्वज के स्वरूप पर शोध किया और विभिन्न देशों के झंडों का अध्ययन किया।

1916 में उन्होंने “ए नेशनल फ्लैग फॉर इंडिया” नामक पुस्तिका प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने भारत के लिए 30 से अधिक ध्वज डिजाइनों का प्रस्ताव रखा। यह कार्य उनके गहन अध्ययन और राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक था। उस समय उनका उद्देश्य केवल एक झंडा बनाना नहीं था, बल्कि ऐसा प्रतीक तैयार करना था जो भारत की सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को दर्शा सके।

1921 में कांग्रेस के विजयवाड़ा अधिवेशन में पिंगली वेंकैया ने अपने ध्वज का प्रारंभिक डिजाइन महात्मा गांधी को प्रस्तुत किया। इस डिजाइन में लाल और हरे रंग का प्रयोग किया गया था, जो देश के प्रमुख समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे। गांधीजी ने इसमें सफेद पट्टी जोड़ने का सुझाव दिया, जो शांति और अन्य समुदायों का प्रतीक बने। साथ ही चरखे को भी शामिल किया गया, जो आत्मनिर्भरता, श्रम और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था। इस प्रकार पिंगली वेंकैया का डिजाइन स्वतंत्रता आंदोलन का प्रेरणास्रोत बन गया।

समय के साथ ध्वज के स्वरूप में कुछ परिवर्तन हुए। लाल रंग को केसरिया में बदला गया, सफेद पट्टी मध्य में रखी गई और हरे रंग को नीचे स्थान दिया गया। चरखा ध्वज के केंद्र में स्थापित रहा। यह तिरंगा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान संघर्ष, आशा और एकता का प्रतीक बन गया। सत्याग्रहियों, क्रांतिकारियों और देशभक्तों ने इस तिरंगे को लेकर अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज उठाई।

भारत की स्वतंत्रता से ठीक पहले 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने पिंगली वेंकैया के डिजाइन के आधार पर राष्ट्रीय ध्वज को स्वीकार किया। चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को रखा गया, जो न्याय, धर्म और प्रगति का प्रतीक है। इस प्रकार वर्तमान तिरंगा भारत की पहचान बन गया। यह केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के बलिदान, संघर्ष और स्वतंत्रता की आकांक्षा का प्रतीक है।

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