Reading: धारावाहिक (56)भारत के स्वतंत्रता सेनानी : सूर्य सेन (मास्टर दा)फांसी से पहले सूर्य सेन ने अपने साथियों को अंतिम पत्र लिखा। उसमें उन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना जीवित रखने का संदेश दिया और 18 अप्रैल 1930 के चटगांव विद्रोह को कभी न भूलने का आह्वान किया।

धारावाहिक (56)भारत के स्वतंत्रता सेनानी : सूर्य सेन (मास्टर दा)फांसी से पहले सूर्य सेन ने अपने साथियों को अंतिम पत्र लिखा। उसमें उन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना जीवित रखने का संदेश दिया और 18 अप्रैल 1930 के चटगांव विद्रोह को कभी न भूलने का आह्वान किया।

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्रता सेनानी : सूर्य सेन (मास्टर दा)
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन: न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी विचार
सूर्य सेन का जन्म चटगांव के नोआपाड़ा क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता का नाम रमानिरंजन सेन था। वे पेशे से एक अध्यापक थे और विद्यार्थियों के बीच “मास्टर दा” के नाम से प्रसिद्ध हुए। वर्ष 1916 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान उनके एक शिक्षक ने उन्हें क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित किया। इसी समय वे अनुशीलन समिति से जुड़ गए और स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा में सक्रिय हो गए। आगे की पढ़ाई के लिए वे बहरामपुर कॉलेज (वर्तमान मुर्शीदाबाद विश्वविद्यालय) गए, जहाँ वे युगांतर संगठन के संपर्क में आए और उसके क्रांतिकारी विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए।

चटगांव विद्रोह की योजना
सूर्य सेन ने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए संगठित प्रयास शुरू किए। 18 अप्रैल 1930 को उन्होंने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (IRA) का गठन किया। इस संगठन का उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को समाप्त करना था। सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार पर धावा बोला, हथियारों पर कब्जा किया और अंग्रेजी शासन के अंत की घोषणा कर दी। इस घटना से पूरे बंगाल में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी और कुछ समय के लिए चटगांव क्षेत्र में अंग्रेजी शासन लगभग समाप्त हो गया।

विद्रोह का प्रभाव और संघर्ष
चटगांव विद्रोह का प्रभाव दूर-दूर तक फैला। देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता आंदोलन उग्र हो गया। इस क्रांति में प्रीतिलता वाद्देदार और कल्पना दत्त जैसी महिला क्रांतिकारियों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजी सरकार ने दमन चक्र चलाया और अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी दी गई, प्रीतिलता ने गिरफ्तारी से बचने के लिए जहर खाकर बलिदान दिया, जबकि कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

गिरफ्तारी और विश्वासघात
चटगांव विद्रोह के बाद सूर्य सेन लंबे समय तक छिपकर आंदोलन का संचालन करते रहे। वे कभी किसान, कभी पुजारी, कभी मजदूर तो कभी धार्मिक मुसलमान का वेश धारण कर अंग्रेजों से बचते रहे। अंततः फरवरी 1933 में नेत्र सेन नामक व्यक्ति ने धन के लालच में उनकी सूचना अंग्रेजों को दे दी, जिससे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में क्रांतिकारियों ने नेत्र सेन को दंडित किया, लेकिन सूर्य सेन अंग्रेजों के हाथों पड़ चुके थे।

यातनाएँ और बलिदान
गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों ने सूर्य सेन पर अमानवीय अत्याचार किए। उनके दांत तोड़ दिए गए, नाखून उखाड़ दिए गए और शरीर को बुरी तरह क्षत-विक्षत कर दिया गया। अचेत अवस्था में ही उन्हें फांसी के तख्ते तक घसीटा गया। 12 जनवरी 1934 को सूर्य सेन और उनके साथी तारकेश्वर दस्तीदार को फांसी दे दी गई। अंग्रेजों ने उनके शव का अंतिम संस्कार भी नहीं होने दिया और उसे समुद्र में फेंक दिया गया।

अंतिम संदेश और विरासत
फांसी से पहले सूर्य सेन ने अपने साथियों को अंतिम पत्र लिखा। उसमें उन्होंने स्वतंत्र भारत का सपना जीवित रखने का संदेश दिया और 18 अप्रैल 1930 के चटगांव विद्रोह को कभी न भूलने का आह्वान किया। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। सूर्य सेन ने दिखा दिया कि एक शिक्षक भी अपने साहस, नेतृत्व और देशभक्ति से साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती दे सकता है।

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