आखिर क्यों हो रहा है जनता के साथ...?
न्यूज इइंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स
पर्वतीय राज्य हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति पिछले कुछ वर्षों में लगातार दबाव में रही है। सीमित संसाधनों, बढ़ते कर्ज और राजस्व के सीमित स्रोतों के बीच सरकारें विकास और वित्तीय अनुशासन का संतुलन बनाने की कोशिश करती रही हैं। लेकिन एक स्थायी प्रवृत्ति साफ दिखाई देती है—सरकार कोई भी हो, टैक्सों का दायरा और दर दोनों बढ़ते जाते हैं। यह स्थिति आम नागरिकों, कर्मचारियों, व्यापारियों और पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।
राज्य की आय का बड़ा हिस्सा केंद्र पर निर्भर रहता है, जबकि खर्च का दायरा लगातार बढ़ रहा है। वेतन, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, बुनियादी ढांचा और सब्सिडी जैसे मदों में भारी खर्च सरकार की वित्तीय स्थिति को कमजोर करते हैं। नतीजतन राजस्व बढ़ाने का सबसे आसान रास्ता टैक्सों में वृद्धि या नई शुल्क व्यवस्था लागू करना बन जाता है। बिजली दरों में संशोधन, पानी के शुल्क, परिवहन किराए, स्टांप ड्यूटी, पर्यटन शुल्क और विभिन्न सेवाओं पर बढ़ते टैक्स इस प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
यह भी एक तथ्य है कि पहाड़ी राज्य होने के कारण औद्योगिक विस्तार सीमित है। बड़े उद्योगों से मिलने वाला कर राजस्व अपेक्षाकृत कम है। पर्यटन और सेवा क्षेत्र ही मुख्य आधार हैं, लेकिन इन पर अधिक कर लगाने से प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है। पर्यटन महंगा होने पर पर्यटक अन्य राज्यों का रुख कर सकते हैं, जिससे दीर्घकालिक नुकसान की आशंका बढ़ जाती है। इसलिए टैक्स बढ़ाना तात्कालिक समाधान तो हो सकता है, लेकिन यह स्थायी आर्थिक सुधार का विकल्प नहीं है।
राज्य पर बढ़ता कर्ज भी चिंता का बड़ा कारण है। जब आय से अधिक खर्च होता है तो सरकारें कर्ज लेकर योजनाएं चलाती हैं। फिर उस कर्ज का ब्याज और मूलधन चुकाने के लिए अतिरिक्त राजस्व की जरूरत पड़ती है, जिसका भार अंततः जनता पर टैक्स के रूप में आता है। इस चक्र को तोड़े बिना आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो सकती। यही कारण है कि हर बजट में राजस्व बढ़ाने के उपायों की चर्चा अधिक और खर्च कम करने के ठोस कदम कम दिखाई देते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें टैक्स बढ़ाने के बजाय राजस्व के नए स्रोत विकसित करें। पर्यटन को वर्षभर सक्रिय बनाना, कृषि-बागवानी उत्पादों का मूल्य संवर्धन, जलविद्युत परियोजनाओं से अधिक लाभ, डिजिटल सेवाओं का विस्तार और स्थानीय उद्यमों को बढ़ावा देना ऐसे उपाय हैं जो दीर्घकालिक समाधान दे सकते हैं। साथ ही गैर-जरूरी खर्चों पर अंकुश और योजनाओं की प्राथमिकता तय करना भी उतना ही जरूरी है।
हिमाचल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए संतुलित नीति की जरूरत है—जहां विकास भी हो और जनता पर टैक्स का बोझ असहनीय न बने। यदि टैक्स बढ़ाने की रफ्तार लगातार ऊपर जाती रही, तो इसका असर उपभोग, निवेश और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा। समय की मांग है कि सरकारें अल्पकालिक राजस्व वृद्धि से आगे बढ़कर स्थायी आर्थिक ढांचे की दिशा में ठोस कदम उठाएं, ताकि हिमाचल की अर्थव्यवस्था मजबूत भी हो और जनता पर बोझ भी नियंत्रित रहे।

