
भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि कोटि नमन न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध राजाओं और रानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें समाज के हर वर्ग के वीरों और वीरांगनाओं का योगदान रहा है। जहाँ एक ओर इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं के साहस का वर्णन मिलता है, वहीं दूसरी ओर दलित समाज की बहादुर योद्धा उदा देवी पासी का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

उदा देवी पासी का नाम भारतीय विद्रोह 1857 के उन वीर योद्धाओं में लिया जाता है जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अदम्य साहस के साथ युद्ध किया। उनका विवाह मक्का पासी से हुआ था, जो अवध की शासिका बेगम हजरत महल की सेना में एक सैनिक थे। जब अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह भड़का, तब उदा देवी ने भी युद्ध में शामिल होने का संकल्प लिया। उन्होंने बेगम हजरत महल से मिलकर युद्ध में भाग लेने की अनुमति माँगी। बेगम हजरत महल ने उनके साहस को देखते हुए उनके नेतृत्व में एक महिला बटालियन का गठन करवाया।
नवंबर 1857 में लखनऊ के प्रसिद्ध सिकंदर बाग में अंग्रेजों और भारतीय क्रांतिकारियों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इसी युद्ध में उदा देवी पासी ने असाधारण वीरता का परिचय दिया। जब उन्हें यह समाचार मिला कि उनके पति मक्का पासी युद्ध में शहीद हो गए हैं, तो उन्होंने अंग्रेजों से बदला लेने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी टुकड़ी को निर्देश देने के बाद एक पीपल के पेड़ पर चढ़कर छिपे हुए स्थान से अंग्रेज सैनिकों पर गोलीबारी शुरू कर दी।
उनकी सटीक निशानेबाजी से कई अंग्रेज सैनिक मारे गए। ब्रिटिश अधिकारियों को जब यह संदेह हुआ कि कोई छिपा हुआ स्नाइपर सैनिकों को निशाना बना रहा है, तो उन्होंने पेड़ों पर गोली चलाने का आदेश दिया। इसी दौरान उदा देवी पेड़ से गिर पड़ीं और वीरगति को प्राप्त हुईं। जब अंग्रेज सैनिकों ने उनकी पहचान की, तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि इतने सैनिकों को मार गिराने वाला योद्धा एक महिला थी।
ब्रिटिश सैनिक विलियम फोर्ब्स-मिटचेल ने अपनी पुस्तक “Reminiscences of the Great Mutiny” में उदा देवी के साहस का उल्लेख करते हुए लिखा कि वह दो भारी पिस्तौल से लैस थीं और अपने छिपे हुए स्थान से उन्होंने कई सैनिकों को मार गिराया था।
आज उदा देवी पासी को 1857 की क्रांति की दलित वीरांगना के रूप में सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और पीलीभीत क्षेत्र में पासी समाज के लोग हर वर्ष 16 नवंबर को उनकी शहादत दिवस के रूप में मनाते हैं।
उदा देवी पासी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजाओं और सामंतों के संघर्ष से नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग—विशेषकर दलित और वंचित समुदायों—की वीरता और बलिदान से प्राप्त हुई। उनका नाम भारतीय इतिहास में साहस, स्वाभिमान और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में सदैव अमर रहेगा।

