स्वतंत्र सैनानी दादाभाई नौरोजी 1866 में उन्होंने लंदन में East India Association की स्थापना की,

भारत के स्वतंत्रता सेनानियों को कोटि-कोटि नमन-संपादक: राम प्रकाश वत्स
भारत की स्वतंत्रता का संग्राम केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह त्याग, बलिदान और अटूट देशभक्ति की भावना से भरा हुआ एक महान संघर्ष था। इस संघर्ष में असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनका योगदान अमूल्य है, क्योंकि उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख, परिवार और यहां तक कि अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। यह संघर्ष कोई मामूली नहीं था, बल्कि इसमें भारी नुकसान, यातनाएं और जनहानि हुई, जिसे शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना कठिन है।स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाखों भारतीयों ने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों का सामना किया। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों, कठोर कानूनों और आर्थिक शोषण के कारण जनता त्रस्त थी। अनेक बार शांतिपूर्ण आंदोलनों पर भी बर्बरता से लाठियां बरसाई गईं और गोलियां चलाई गईं। जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसे भयावह घटनाओं में सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान चली गई, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में डाल दिया गया, जहां उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं।इस संघर्ष में केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाओं, युवाओं और यहां तक कि बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। कई वीरों ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। वहीं महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अहिंसात्मक आंदोलनों ने जनता को एकजुट किया और ब्रिटिश शासन की नींव को हिला दिया।इसी कड़ी में दादाभाई नौरोजी का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्हें “ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया” कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की नींव को मजबूत किया। 1866 में उन्होंने लंदन में East India Association की स्थापना की, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के सामने भारतीयों की समस्याओं को रखना और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाना था। यह संस्था भारतीयों और सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारियों के सहयोग से बनी थी, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के मुद्दों को पहचान मिली।
दादाभाई नौरोजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Poverty and Un-British Rule in India में “ड्रेन थ्योरी” प्रस्तुत की। इस सिद्धांत के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया कि ब्रिटिश शासन भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से इंग्लैंड ले जा रहा है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है। उनका यह विचार भारतीयों के लिए आंखें खोलने वाला साबित हुआ और इससे स्वतंत्रता आंदोलन को वैचारिक मजबूती मिली।उन्होंने Vernacular Press Act 1878 का भी कड़ा विरोध किया, क्योंकि यह कानून भारतीय भाषाओं के प्रेस की स्वतंत्रता को दबाने के लिए बनाया गया था। नौरोजी का मानना था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी भी समाज के विकास के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारतीयों के प्रतिनिधित्व की मांग की और प्रशासन में भारतीयों की भागीदारी बढ़ाने के लिए भी निरंतर प्रयास किए।स्वतंत्रता संग्राम में हुए भारी नुकसान और जनहानि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हजारों लोग गोलियों के शिकार हुए, लाखों ने जेलों में कष्ट सहे और अनगिनत परिवार उजड़ गए। किसानों, मजदूरों और आम जनता ने भी इस संघर्ष में अपना सब कुछ खो दिया। फिर भी उनके हौसले कभी नहीं टूटे, क्योंकि उनके दिल में देश के प्रति अटूट प्रेम और आजादी पाने की तीव्र इच्छा थी।अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान अनमोल और अद्वितीय है। उनके बलिदान और संघर्ष के कारण ही आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि देश के प्रति समर्पण, साहस और एकता से किसी भी बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।

