भारत के स्वतंत्र सैनानीकित्तूर की वीरांगना रानी चेन्नम्मा को कोटि कोटि नमन -संपादक राम प्रकाश बत्स
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल पुरुष वीरों की गाथाओं से ही नहीं, बल्कि अदम्य साहस और त्याग से भरी वीरांगनाओं की कहानियों से भी आलोकित है। इन वीरांगनाओं में सबसे अग्रणी नाम कर्नाटक की धरती पर जन्मी कित्तूर की रानी चेन्नम्मा का है। उन्हें भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मान दिया जाता है, क्योंकि उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लगभग 33 वर्ष पहले ही अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया था। उनका संघर्ष भारतीय महिलाओं की वीरता, आत्मसम्मान और देशभक्ति का अनुपम उदाहरण है।
रानी चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1778 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के काकाती गाँव में एक लिंगायत परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें असाधारण प्रतिभा और साहस दिखाई देता था। उस समय जब अधिकांश लड़कियों को सीमित शिक्षा मिलती थी, तब चेन्नम्मा को घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी जैसे युद्धक कौशलों का प्रशिक्षण दिया गया। यही कारण था कि आगे चलकर वे एक कुशल योद्धा और दृढ़ नेतृत्व वाली रानी के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
युवावस्था में उनका विवाह कित्तूर रियासत के राजा मल्लसर्जा देसाई से हुआ। विवाह के बाद वे कित्तूर की रानी बनीं और राज्य के प्रशासनिक कार्यों में भी सक्रिय रूप से भाग लेने लगीं। किंतु कुछ समय बाद उनके पति का निधन हो गया। इस दुखद घटना के बाद राज्य की बागडोर रानी चेन्नम्मा के हाथों में आ गई। दुर्भाग्य से उनका एकमात्र पुत्र भी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सका। राज्य के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने शिवलिंगप्पा नामक बालक को गोद लेकर उत्तराधिकारी घोषित किया।
इसी समय अंग्रेजों की कुटिल नीति सामने आई। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ (हड़प नीति) के तहत गोद लिए गए पुत्र को वैध उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और कित्तूर रियासत को अपने साम्राज्य में मिलाने की योजना बनाई। यह रानी चेन्नम्मा के आत्मसम्मान और राज्य की स्वतंत्रता पर सीधा आघात था। उन्होंने अंग्रेजों के इस अन्यायपूर्ण निर्णय को स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया।
सन 1824 में रानी चेन्नम्मा ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। यह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि उस समय अंग्रेजों के विरुद्ध खुला युद्ध छेड़ना अत्यंत साहस का कार्य था। रानी ने अपनी सेना के साथ अंग्रेजी फौज का सामना किया। अक्टूबर 1824 में हुए पहले युद्ध में कित्तूर की सेना ने अंग्रेजों को करारी हार दी। इस युद्ध में ब्रिटिश आयुक्त सेंट जॉन थैकरे मारा गया। यह विजय रानी चेन्नम्मा के अदम्य साहस और युद्धक क्षमता का प्रमाण थी।
हालाँकि अंग्रेजों ने अपनी पराजय को आसानी से स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अधिक बड़ी सेना और संसाधनों के साथ दोबारा आक्रमण किया। सीमित सैनिकों और संसाधनों के बावजूद रानी चेन्नम्मा ने अंतिम समय तक संघर्ष किया। अंततः भारी सैन्य शक्ति के सामने उन्हें पराजित होना पड़ा और अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें कर्नाटक के बैलहोंगल किले की जेल में बंद कर दिया गया, जहाँ 1829 में उनका देहांत हो गया।
रानी चेन्नम्मा का जीवन केवल एक रानी की कहानी नहीं, बल्कि स्वाभिमान, साहस और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष की प्रेरणादायक गाथा है। उन्होंने उस दौर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया, जब भारत में संगठित स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत भी नहीं हुई थी। उनके साहस ने आने वाली पीढ़ियों, विशेषकर महिलाओं को यह संदेश दिया कि देश की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए संघर्ष में महिलाएँ भी पुरुषों से कम नहीं हैं।
आज रानी चेन्नम्मा को भारत की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। कर्नाटक सहित पूरे देश में उनकी स्मृति में स्मारक, प्रतिमाएँ और उत्सव आयोजित किए जाते हैं। उनका जीवन भारतीय इतिहास में यह संदेश देता है कि जब अन्याय के विरुद्ध आवाज उठती है, तब इतिहास में अमर गाथाएँ जन्म लेती हैं।
इस प्रकार रानी चेन्नम्मा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वह अग्रदूत थीं, जिन्होंने अपने साहस और बलिदान से महिलाओं की वीरता का स्वर्णिम अध्याय इतिहास में अंकित कर दिया।

