संपादक राम प्रकाश बत्स
हिमालय की गोद में बसे Himachal Pradesh की अर्थव्यवस्था लंबे समय से सीमित संसाधनों और केंद्रीय सहायता पर निर्भर रही है। लेकिन अब प्रदेश सरकार आत्मनिर्भरता की दिशा में एक नया विमर्श खड़ा कर रही है। मुख्यमंत्री Sukhvinder Singh Sukhu का हालिया बयान इसी सोच को सामने लाता है। उनका कहना है कि यदि हिमाचल में स्थापित और अब मुक्त (फ्री) हो चुके बिजली परियोजनाओं से राज्य को 50 प्रतिशत रॉयल्टी मिले, तो राजस्व घाटा अनुदान की आवश्यकता ही समाप्त हो सकती है।
मुख्यमंत्री का तर्क सीधा है—प्रदेश के जल, जंगल और जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके बड़ी-बड़ी परियोजनाएं बिजली पैदा कर रही हैं, लेकिन उस उत्पादन से मिलने वाला आर्थिक लाभ राज्य को अपेक्षाकृत कम मिल रहा है। वर्तमान में केंद्रीय उपक्रमों—SJVN Limited, NTPC Limited और NHPC Limited—से राज्य को लगभग 12 प्रतिशत रॉयल्टी ही मिलती है। मुख्यमंत्री का मानना है कि यह अनुपात प्रदेश के योगदान के अनुरूप नहीं है।
संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह मुद्दा केवल हिमाचल का नहीं, बल्कि उन सभी पहाड़ी राज्यों का है जहां प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं, परंतु उनके उपयोग से मिलने वाला लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। यदि संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा हो, तो राज्य अपने विकास की गति को और मजबूत कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री सुक्खू ने इस बहस के बीच एक और राजनीतिक आरोप का जवाब भी दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिमाचल सरकार ने Punjab के वाहनों पर कोई नया टैक्स नहीं लगाया है और न ही प्रदेश में कर्मचारियों के वेतन या पेंशन में कटौती की गई है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि जहां पंजाब सरकार अपने कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना देने का वादा पूरा नहीं कर सकी, वहीं हिमाचल सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही इसे बहाल कर दिया था।
यहां संपादकीय प्रश्न यह भी उठता है कि क्या राजनीतिक बयानबाजी के बीच वास्तविक आर्थिक मुद्दे दब जाते हैं? प्रदेश की जनता के लिए अधिक महत्वपूर्ण यह है कि राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, विकास योजनाएं जारी रहें और कर्मचारियों व पेंशनरों की आर्थिक सुरक्षा बनी रहे।
मुख्यमंत्री का दावा है कि प्रदेश सरकार ने वित्तीय अनुशासन के साथ अर्थव्यवस्था को संभाला है। वेतन, पेंशन और सामाजिक योजनाओं में किसी प्रकार की कटौती नहीं की गई है और सरकार आगामी बजट में आत्मनिर्भरता की दिशा में और कदम उठाने की तैयारी कर रही है।
दरअसल, हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए आत्मनिर्भरता का मार्ग आसान नहीं है, लेकिन यदि प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले लाभ का उचित हिस्सा राज्य को प्राप्त हो, तो यह लक्ष्य दूर भी नहीं। अब देखने वाली बात यह होगी कि केंद्र और राज्य के बीच संसाधनों की इस बहस का समाधान किस दिशा में जाता है—और क्या हिमाचल सचमुच अपने संसाधनों के बल पर आर्थिक मजबूती की नई कहानी लिख पाता है।
संसाधनों का अधिकार और आत्मनिर्भर हिमाचल की राह
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