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एंट्री टैक्स और टोल शुल्क के लिऐ जनता दो पाटों के बीच पीस रही है, लाभ किसको?(संपादकीय दृष्टिकोण)

RamParkash Vats
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उत्तर भारत के दो पड़ोसी राज्य—हिमाचल प्रदेश और पंजाब—इन दिनों एक ऐसे मुद्दे को लेकर चर्चा में हैं, जो सीधे-सीधे आम जनता की जेब से जुड़ा हुआ है। यह विवाद किसी राजनीतिक बयानबाज़ी या सीमा रेखा को लेकर नहीं, बल्कि वाहनों पर लगाए जाने वाले एंट्री टैक्स और टोल शुल्क को लेकर खड़ा हुआ है। हालात कुछ ऐसे बनते दिखाई दे रहे हैं कि राजनीतिक निर्णयों की इस खींचतान में आम नागरिक स्वयं को दो पाटों के बीच पिसता हुआ महसूस कर रहा है।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाल ही में राज्य में प्रवेश करने वाले बाहरी वाहनों पर एंट्री टोल शुल्क बढ़ाने का निर्णय लिया है। नई व्यवस्था के अनुसार अब दूसरे राज्यों से आने वाले निजी वाहनों को पहले की तुलना में कहीं अधिक शुल्क देना होगा। सरकार का तर्क है कि इससे राज्य के राजस्व में वृद्धि होगी और सड़क अवसंरचना के रख-रखाव के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध होंगे।
निस्संदेह, किसी भी राज्य के लिए आर्थिक संसाधनों का सुदृढ़ होना आवश्यक है। सड़कें बेहतर हों, परिवहन व्यवस्था सुगम हो और विकास कार्यों के लिए धन उपलब्ध हो—यह सब सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। परंतु प्रश्न तब उठता है जब इन नीतियों का भार सीधे जनता के कंधों पर आकर टिक जाता है।
हिमाचल और पंजाब की सीमाएं केवल प्रशासनिक रेखाएं भर नहीं हैं, बल्कि इनके आर-पार हजारों लोगों का दैनिक जीवन जुड़ा हुआ है। पंजाब के नंगल, रूपनगर (रोपड़) और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों के अनेक लोग रोज़गार, व्यापार, शिक्षा और सामाजिक कारणों से प्रतिदिन हिमाचल प्रदेश की सीमा में प्रवेश करते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह टोल वृद्धि केवल एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि हर दिन का बढ़ता हुआ आर्थिक बोझ है।
यही कारण है कि इस निर्णय के विरोध की आवाज़ें पंजाब में भी उठने लगी हैं। पंजाब के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि हिमाचल बाहरी वाहनों पर अतिरिक्त शुल्क लगाएगा, तो पंजाब भी हिमाचल के वाहनों पर उसी तर्ज पर प्रतिदानात्मक कर लगाने पर विचार कर सकता है।
यदि ऐसा होता है तो स्थिति और जटिल हो सकती है। तब हिमाचल के वाहन पंजाब में प्रवेश करते समय शुल्क देंगे और पंजाब के वाहन हिमाचल में प्रवेश करते समय। इस प्रकार एक ऐसा चक्र शुरू हो सकता है जिसमें कर का भार अंततः उसी नागरिक पर पड़ेगा, जो रोज़मर्रा की आवश्यकताओं के कारण इन सीमाओं को पार करने के लिए विवश है।
दरअसल, यह केवल दो राज्यों के बीच राजस्व नीति का प्रश्न नहीं है, बल्कि इससे जुड़ा हुआ व्यापक सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी है। हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पर्यटन पर निर्भर करता है। यदि प्रवेश शुल्क और टोल अत्यधिक बढ़ जाते हैं, तो पर्यटकों के लिए यात्रा महंगी हो सकती है। इसका सीधा असर पर्यटन उद्योग, परिवहन व्यवसाय और स्थानीय व्यापार पर भी पड़ सकता है।
इसके अतिरिक्त, यह स्थिति “एक देश–एक कर व्यवस्था” की भावना पर भी प्रश्न खड़े करती है। जब देश के भीतर ही अलग-अलग राज्यों में प्रवेश करने के लिए अलग-अलग करों की व्यवस्था होगी, तो अंतरराज्यीय आवागमन और व्यापार की सहजता प्रभावित होना स्वाभाविक है।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णयों के बीच आम नागरिक की सुविधा और आर्थिक स्थिति कहीं पीछे छूट जाती है। सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए राज्य की सीमा केवल नक्शे पर खिंची एक रेखा है, परंतु उनके रिश्ते, रोजगार और जीवन की आवश्यकताएं इन सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक हैं।
आज स्थिति ऐसी बनती दिखाई दे रही है कि यदि एक राज्य कर बढ़ाता है, तो दूसरा राज्य भी उसी राह पर चलने की सोचने लगता है। परिणामस्वरूप करों की यह प्रतिस्पर्धा जनता के लिए एक नए बोझ का कारण बन जाती है। सच तो यह है कि इस पूरी व्यवस्था में जनता ही वह चक्की का दाना बन जाती है, जो दो पाटों के बीच लगातार पिसती रहती है।
समय की आवश्यकता यह है कि पड़ोसी राज्य प्रतिस्पर्धा के बजाय संवाद और संतुलन की नीति अपनाएं। राजस्व बढ़ाने के उपाय ऐसे हों जो विकास को गति दें, परंतु जनता पर अनावश्यक आर्थिक भार न डालें।
क्योंकि अंततः सीमा, सड़क और संसाधन तो साझा हो सकते हैं, लेकिन यदि जनता का विश्वास टूट जाए तो उसका दुष्परिणाम पूरे क्षेत्र को भुगतना पड़ता है।

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