Editorial articles on current events न्यूज़ इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश बत्स

राज्यसभा कुर्सी… जोर लगाकर हेईंसा
हिमाचल प्रदेश की एकमात्र राज्यसभा सीट को लेकर सियासी पारा चरम पर है। सत्तारूढ़ कांग्रेस ने विधायक दल की बैठक बुलाकर एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है, लेकिन प्रत्याशी की औपचारिक घोषणा में हो रही देरी कई सवाल खड़े कर रही है। क्या पार्टी पिछली बार हुए ‘विश्वासघात’ की पुनरावृत्ति से आशंकित है? या फिर नाम पर अंतिम सहमति की प्रक्रिया अभी जारी है?
कैबिनेट हर्षवर्धन चौहान ने स्पष्ट कहा है की उम्मीदवार हिमाचल का हो या बाहर का, सभी विधायक एकजुट होकर मतदान करेंगे। लेकिन राजनीतिक गलियारों में ‘स्थानीय बनाम बाहरी’ चेहरे की बहस थमती नहीं दिख रही। जिन नामों की चर्चा है उनमें आनंद शर्मा, रजनी पाटिल, धनीराम शांडिल और पवन खेड़ा प्रमुख हैं। आनंद शर्मा का हिमाचल दौरा कयासों को और हवा दे रहा है।
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने संकेत दिया है कि प्रत्याशी हिमाचली होगा और इस बार “लोकतंत्र की खरीद-फरोख्त” नहीं होने दी जाएगी। यह बयान सीधे तौर पर पिछले चुनाव की क्रॉस वोटिंग की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है, जिसने कांग्रेस को असहज स्थिति में ला खड़ा किया था।
उधर भाजपा भी प्रतीक्षा की रणनीति पर है। प्रदेश अध्यक्ष राजीव बिंदल और नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने संकेत दिए हैं कि पार्टी परिस्थितियों का आकलन कर अंतिम दांव चलेगी। भाजपा के लिए भी यह ‘टेढ़ी खीर’ है—यदि कांग्रेस एकजुट रही तो मुकाबला औपचारिक रह सकता है, लेकिन भीतर असंतोष उभरा तो सियासत करवट ले सकती है।
राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ल के साथ मुख्यमंत्री की हल्की-फुल्की नोकझोंक ने भी राजनीतिक माहौल को रंगीन बना दिया है,।
संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व की विश्वसनीयता की परीक्षा है। कांग्रेस के लिए चुनौती भीतर की एकजुटता है, तो भाजपा के लिए अवसर की प्रतीक्षा। हिमाचल की राजनीति में अगला कदम ही तय करेगा कि यह मुकाबला शांतिपूर्ण औपचारिकता रहेगा या फिर अप्रत्याशित मोड़ लेगा।
संपादकीय दृष्टि से कुल मिलाकर यही उचित प्रतीत होता है कि कांग्रेस को राज्यसभा के लिए हिमाचल से ही अपना प्रत्याशी मैदान में उतारना चाहिए। स्थानीय चेहरा न केवल विधायकों की भावनाओं को संतुलित करेगा, बल्कि संगठन में एकजुटता का संदेश भी देगा। पिछले चुनाव के अनुभव को देखते हुए पार्टी किसी प्रकार का जोखिम नहीं लेना चाहेगी। यदि हिमाचली नेता को अवसर मिलता है तो कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ेगा और आने वाले लोकसभा व विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पकड़ मजबूत होगी। बाहरी प्रत्याशी से उपजने वाली असंतोष की संभावनाएं भी स्वतः समाप्त हो जाएंगी।

