Reading: धारावाहिक (36) 🇮🇳 भारत के अमुल्य स्वतंत्र सैनानी अशफाक उल्ला खान भारत माता के इस अमर सपूत को शत-शत नमन।

धारावाहिक (36) 🇮🇳 भारत के अमुल्य स्वतंत्र सैनानी अशफाक उल्ला खान भारत माता के इस अमर सपूत को शत-शत नमन।

RamParkash Vats
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( भारत के स्वतंत्र सैनानीयो को कोटि -कोटि नमन) न्यूज इंडिया आजतक लेखिक संपादक राम प्रकाश बत्स

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास त्याग, तपस्या और बलिदान की अमर गाथाओं से भरा है। इन्हीं अमर शहीदों में एक तेजस्वी नाम है — अशफाक उल्ला खान।
जन्म और प्रारंभिक जीवन

अशफाक उल्ला खान का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में एक पठान परिवार में हुआ। बचपन से ही उनके मन में देशभक्ति की प्रबल भावना थी। वे कविता और लेखन में भी रुचि रखते थे और ‘हसरत’ उपनाम से शायरी किया करते थे। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों ने उनके भीतर क्रांति की ज्वाला प्रज्वलित कर दी।
क्रांतिकारी जीवन

वे महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल के घनिष्ठ मित्र बने। उनकी मित्रता हिंदू–मुस्लिम एकता की अनुपम मिसाल थी। वर्ष 1924 में वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े। उनका उद्देश्य सशस्त्र क्रांति के माध्यम से भारत को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना था।
काकोरी कांड (1925)
9 अगस्त 1925 को उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन डकैती को अंजाम दिया। इस कार्रवाई का उद्देश्य अंग्रेजों का सरकारी खजाना लूटकर क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना था। यह घटना ब्रिटिश शासन के विरुद्ध खुली चुनौती थी।
गिरफ्तारी और शहादत

काकोरी कांड के बाद वे लगभग दस महीने तक फरार रहे, किंतु अंततः गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर मुकदमा चलाया गया और 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु मात्र 27 वर्ष थी।
अंतिम शब्द और विरासत
फांसी से पूर्व उन्होंने अत्यंत शांत भाव से कहा—
“गर आरज़ू है कुछ, बस आरज़ू तो ये है,
रख दे ज़रा सी कोई ख़ाक-ए-वतन कफ़न में।”
उनका बलिदान केवल एक क्रांतिकारी की शहादत नहीं था, बल्कि वह राष्ट्रीय एकता, साहस और अटूट देशभक्ति का प्रतीक बन गया। अशफाक उल्ला खान आज भी भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

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