भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि-कोटि नमन – लेखिक संपादक राम प्रकाश बत्स भरमाड़ (जवाली)
जब-जब भारत की स्वतंत्रता की गाथा लिखी जाएगी, तब-तब डॉ अनुग्रह नारायण सिंह का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। वे केवल एक राजनेता नहीं थे—वे त्याग, तपस्या और कर्म की मूर्ति थे। राष्ट्र की पुकार पर जिन्होंने अपने नवोदित वकालत पेशे को ठुकरा दिया, वे ही आगे चलकर आधुनिक बिहार के शिल्पकार बने।

सन् 1917 का वह ऐतिहासिक क्षण, जब चंपारण की धरती पर नील के अत्याचारों से कराहते किसानों की आह आकाश को चीर रही थी, तब महात्मा गांधी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होने वालों में अनुग्रह बाबू अग्रणी थे। कमिश्नर की आपत्तियों की परवाह किए बिना सत्य की मशाल लेकर गांधीजी चंपारण पहुँचे, और उनके साथ निर्भीक सहयोगी के रूप में अनुग्रह बाबू भी आगे आए। वृजकिशोर बाबू और डॉ राजेन्द्र प्रसाद के साथ उन्होंने वह व्रत लिया—यदि आवश्यकता पड़ी तो जेल जाएंगे, पर अन्याय के आगे झुकेंगे नहीं।
यही वह क्षण था जब उनके जीवन की दिशा बदल गई। त्याग के पथ पर चल पड़े उस युवक ने यह नहीं सोचा कि नया-नया वकालत का पेशा छूट जाएगा, आर्थिक हानि होगी। जिसने राष्ट्र को अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, उसके लिए व्यक्तिगत लाभ-हानि का कोई मूल्य नहीं होता। चंपारण आंदोलन के 45 महीनों तक वे अडिग रहे। गांधीजी के आश्रम में रहकर उन्होंने स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता और सेवा का पाठ सीखा—और वही उनके जीवन का शाश्वत संबल बना।
सन् 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन से लेकर 1929 में किसान संगठन के लिए सरदार पटेल के साथ यात्राओं तक, अनुग्रह बाबू निरंतर राष्ट्रकार्य में जुटे रहे। 26 जनवरी 1930 को जब देशभर में स्वतंत्रता की घोषणा पढ़ी गई, तब अनेक स्थानों पर उन्होंने स्वयं वह उद्घोष किया। उनका स्वर केवल शब्द नहीं था—वह स्वाधीनता की प्रतिज्ञा था।
नमक सत्याग्रह के दिनों में वे फिर सक्रिय हुए। 26 जनवरी 1933 को पटना में घोषणा पढ़ते समय उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पंद्रह मास की सजा और हजारीबाग जेल—परंतु उनके संकल्प में तनिक भी शिथिलता नहीं आई। जेल की दीवारों के भीतर रहते हुए जब बिहार के भीषण भूकंप का समाचार मिला, तो उनका हृदय व्याकुल हो उठा। तीन सप्ताह पश्चात रिहाई मिलते ही वे राहत कार्य में कूद पड़े। राजेन्द्र बाबू के साथ उन्होंने मुजफ्फरपुर और मुंगेर के पीड़ितों की सेवा में दिन-रात एक कर दिया। सेवा उनके लिए राजनीति नहीं, साधना थी।
रामगढ़ अधिवेशन 1940 में उनकी संगठन-शक्ति का अनुपम परिचय मिला। जब गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह का आह्वान किया, तो वे पुनः गिरफ्तार हुए। 1942 के ‘करो या मरो’ आंदोलन में भी वे अग्रिम पंक्ति में रहे। जेल, यातना, दमन—कुछ भी उनके मनोबल को डिगा न सका। 1944 में जब वे मुक्त हुए, तब तक वे केवल एक नेता नहीं, बल्कि जनता के हृदय-सम्राट बन चुके थे।
स्वाधीनता के उपरांत भी उनका त्याग समाप्त नहीं हुआ। 1946 से 1957 तक वे बिहार के प्रथम उपमुख्यमंत्री सह वित्त मंत्री रहे। सत्ता के शिखर पर पहुँचकर भी उनके जीवन में सादगी की वही ज्योति जलती रही। सरकारी यात्राओं में अपने वेतन से भोजन करना, बिना काफिले और तामझाम के दूरदराज़ क्षेत्रों का भ्रमण करना—यह सब उनके चरित्र की गवाही देता है।
उन्होंने बिहार के प्रशासनिक ढांचे को सुदृढ़ किया, उद्योग-धंधों का विस्तार किया, विकास की नींव रखी। किंतु उनके व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष था—अहंकारहीनता। प्रभावशाली पद पर रहते हुए भी वे जनसाधारण के बीच उसी सहजता से मिलते थे, जैसे कोई अपना परिजन। यही कारण था कि जनमानस ने उन्हें “बिहार विभूति” की संज्ञा दी।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उनके विषय में कहा था कि उनकी संगठन-शक्ति और कार्य के प्रति उत्साह से वे सदैव प्रभावित रहे। यह प्रशंसा केवल शब्द नहीं, उनके जीवन की सच्ची पहचान थी।
आज जब हम स्वतंत्रता की वायु में श्वास लेते हैं, तब यह स्मरण रखना होगा कि यह स्वतंत्रता ऐसे ही तपस्वियों की देन है। डॉ अनुग्रह नारायण सिंह का जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रसेवा केवल भाषणों से नहीं, बल्कि त्याग, साहस और सादगी से होती है। उनका जीवन एक ज्योति-पुंज है—जो आने वाली पीढ़ियों को सत्य, सेवा और स्वाभिमान का मार्ग दिखाता
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