मंथन चिंतन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक संरचना में एक महत्वपूर्ण मोड़ उस समय आया जब सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने जिला उपायुक्तों (डीसी) को भ्रष्टाचार के मामलों में सीधे कार्रवाई की व्यापक शक्तियाँ प्रदान करने की अधिसूचना जारी की। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश भर नहीं, बल्कि शासन–व्यवस्था की कार्यप्रणाली में बदलाव का संकेत है। प्रश्न यह है कि क्या यह कदम वास्तव में भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगा पाएगा, या यह भी समय के साथ औपचारिकता बनकर रह जाएगा?
राज्य में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल और समयसाध्य है। फाइलों का जिला मुख्यालय से सचिवालय तक चक्कर लगाना, अनुमति की प्रतीक्षा, और विभागीय स्तर पर टालमटोल—इन सबके बीच अक्सर आरोपित अधिकारी को पर्याप्त अवसर मिल जाता था कि वह साक्ष्यों को प्रभावित कर सके। ऐसे में जिला स्तर पर त्वरित निर्णय की व्यवस्था एक तार्किक सुधार प्रतीत होती है।
नए प्रावधानों के अंतर्गत अब डीसी प्रारंभिक जांच के उपरांत सीधे अनुशासनात्मक कार्रवाई की संस्तुति कर सकेंगे, विभागीय जांच आरंभ करा सकेंगे और आवश्यक होने पर प्राथमिकी दर्ज कराने के निर्देश भी दे सकेंगे। इससे प्रशासनिक गति में तेजी आएगी और शिकायतकर्ता को तत्काल राहत मिलने की संभावना बढ़ेगी। यह व्यवस्था शासन को जनता के अधिक निकट लाने का प्रयास भी है।
किन्तु किसी भी शक्ति के साथ उत्तरदायित्व अनिवार्य रूप से जुड़ा होता है। यदि डीसी को ‘फ्री हैंड’ दिया गया है, तो यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इन शक्तियों का उपयोग निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ हो। अधिसूचना में यह स्पष्ट किया गया है कि शिकायतों की अनदेखी या पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने पर स्वयं डीसी की जवाबदेही तय की जाएगी। यह प्रावधान संतुलन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति की घोषणा करना अपेक्षाकृत सरल है, किंतु उसे जमीनी स्तर पर लागू करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण। स्थानीय स्तर पर अक्सर राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक दबाव सक्रिय रहते हैं। ऐसे में डीसी को मिली शक्तियाँ तभी सार्थक सिद्ध होंगी जब उन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने का वातावरण भी उपलब्ध कराया जाए। यदि जिला प्रशासन को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखकर कार्य करने दिया गया, तो यह पहल एक आदर्श मॉडल बन सकती है।
इस निर्णय का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष पारदर्शिता है। सरकार ने जिलों में समर्पित शिकायत प्रकोष्ठ अथवा हेल्पलाइन सक्रिय करने के निर्देश दिए हैं। इससे आम नागरिक सीधे अपनी शिकायत दर्ज करा सकेंगे। किंतु केवल हेल्पलाइन स्थापित कर देना पर्याप्त नहीं; आवश्यक है कि शिकायतों की निगरानी, समयबद्ध निस्तारण और कार्रवाई की सार्वजनिक जानकारी भी सुनिश्चित की जाए। पारदर्शिता तभी प्रभावी होती है जब प्रक्रिया और परिणाम दोनों जनता के समक्ष स्पष्ट हों।
प्रशासनिक अमले में इस निर्णय से स्वाभाविक रूप से हलचल है। विकास कार्यों, निविदा प्रक्रियाओं और दैनिक सरकारी कार्यों में अब डीसी की सीधी निगरानी रहेगी। यह भय का वातावरण उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की संस्कृति विकसित करने के लिए होना चाहिए। यदि ईमानदार अधिकारी को यह भरोसा हो कि उसकी निष्पक्षता संरक्षित रहेगी और भ्रष्ट तत्वों को संरक्षण नहीं मिलेगा, तो प्रशासनिक मनोबल स्वतः सुदृढ़ होगा।
फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि भ्रष्टाचार केवल व्यक्तिगत आचरण की समस्या नहीं, बल्कि संरचनात्मक विकृतियों का परिणाम भी है। जटिल नियम, अनावश्यक अनुमतियाँ, और अस्पष्ट प्रक्रियाएँ भ्रष्टाचार को जन्म देती हैं। अतः डीसी को शक्तियाँ देने के साथ-साथ प्रक्रियात्मक सरलीकरण, डिजिटलीकरण और समयबद्ध सेवा गारंटी जैसे सुधार भी समानांतर रूप से आवश्यक हैं। अन्यथा कार्रवाई तो होगी, परंतु समस्या की जड़ जस की तस बनी रहेगी।
सम्पादकीय दृष्टि से यह पहल स्वागतयोग्य है। यह संकेत देती है कि सरकार प्रशासनिक सुधार के लिए साहसिक निर्णय लेने को तैयार है। किंतु इसकी सफलता का मापदंड अधिसूचना नहीं, बल्कि उसके परिणाम होंगे—कितनी शिकायतों पर निष्पक्ष जांच हुई, कितने मामलों में दोषियों को दंड मिला, और क्या आम नागरिक को अपने कार्य के लिए अब भी ‘सुविधा शुल्क’ देने की आवश्यकता पड़ती है या नहीं।
यदि जिला स्तर पर सशक्त, पारदर्शी और उत्तरदायी तंत्र विकसित होता है, तो यह निर्णय वास्तव में भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम सिद्ध हो सकता है। अन्यथा यह भी सरकारी दस्तावेजों के ढेर में एक और आदेश बनकर रह जाएगा। अब निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन इस नई शक्ति को व्यवस्था सुधार के औजार के रूप में उपयोग करता है या केवल औपचारिक कठोरता तक सीमित रखता है।

