न्यूज इंडिया आजतक, संपादक राम प्रकाश बत्स

एक बार फिर पंचायत चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है। गांवों के चौपालों से लेकर चौराहों तक, गलियों से लेकर टियालों और दुकानों तक—हर जगह एक ही चर्चा है कि इस बार कौन-कौन भाग्य आजमाने मैदान में उतरेगा। मानो लोकतंत्र का यह सबसे जीवंत पर्व फिर से दस्तक दे चुका हो।
औपचारिक घोषणा भले शेष हो, परंतु राजनीतिक बिसात पर मोहरे लगभग सज चुके हैं और रणनीतियों की फुसफुसाहट अब खुली बातचीत में बदलने लगी है।
इसलिए प्रत्याशियों के नामों पर हो रही चर्चाएँ केवल राजनीतिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि स्थानीय भविष्य की चिंता भी हैं।दुर्भाग्य से कई बार यह चुनाव व्यक्तिगत समीकरणों, जातीय खांचों या अस्थायी वादों तक सीमित हो जाते हैं। लोकतंत्र की बिसात पर मोहरे फिट करना आसान है, पर जनविश्वास अर्जित करना कठिन। मतदाताओं को भी अब अधिक सजग होने की आवश्यकता है। केवल परिचय या प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि कार्यक्षमता, पारदर्शिता और जनसेवा की भावना को कसौटी बनाना होगा।घोषणा होते ही प्रचार का शोर बढ़ेगा, वादों की झड़ी लगेगी और समीकरणों की नई गणनाएँ सामने आएंगी।
किंतु अंततः पंचायत चुनाव की सार्थकता इसी में है कि यह गांवों को आत्मनिर्भर, उत्तरदायी और विकासोन्मुख दिशा दे सके। यह समय है जब राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर सामूहिक हित का माध्यम बनना होगा।लोकतंत्र का यह पर्व तभी सफल माना जाएगा, जब बिसात के मोहरे नहीं, बल्कि जनसेवा के सच्चे प्रहरी चुने जाएंगे। अब सबकी निगाहें आधिकारिक घोषणा पर टिकी हैं—और उसके साथ ही एक नए ग्रामीण अध्याय के प्रारंभ की प्रतीक्षा भी।

