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पेंशनरों में बढ़ती बेचैनी, बिजली बोर्ड के निजीकरण की आहट और प्रदेश की डगमगाती आर्थिक स्थिति को लेकर आक्रोश अब खुलकर सड़कों पर दिखाई देने लगा है।

RamParkash Vats
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मुख्यकार्यालय,भरमाड़ (जवाली) हिमाचल न्यूज़ रूम, संपादक राम प्रकाश वत्स

‌राजधानी शिमला के चौड़ा मैदान में आज हिमाचल प्रदेश पेंशनर्स संयुक्त संघर्ष समिति के बैनर तले एक दिवसीय जोरदार धरना-प्रदर्शन आयोजित किया गया। धरने की अगुवाई प्रदेश अध्यक्ष सुरेश ठाकुर ने की। प्रदर्शन के दौरान पेंशनरों ने सरकार पर वादाखिलाफी, वित्तीय कुप्रबंधन और कर्मचारी-विरोधी नीतियां अपनाने के आरोप लगाए।
समिति का कहना है कि प्रदेश में बिजली बोर्ड के निजीकरण की ओर बढ़ते कदमों ने कर्मचारियों और पेंशनरों दोनों में असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है। उनका आरोप है कि सार्वजनिक उपक्रमों को कमजोर कर निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है, जिससे भविष्य में पेंशन और सेवा सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
प्रदर्शनकारियों ने याद दिलाया कि 28 नवंबर 2025 को धर्मशाला के जोरावर स्टेडियम में भी बड़ा प्रदर्शन किया गया था, जहां मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विधानसभा सत्र समाप्ति के एक सप्ताह के भीतर वार्ता का आश्वासन दिया था। समिति का आरोप है कि अब तक न तो बातचीत के लिए बुलाया गया और न ही लंबित मांगों पर कोई ठोस निर्णय लिया गया।
प्रदेश की आर्थिक स्थिति को लेकर भी समिति ने गंभीर चिंता जताई। उनका कहना है कि प्रदेश पर एक लाख दस हजार करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज हो चुका है और केंद्र द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बंद किए जाने के बाद वित्तीय संकट और गहरा गया है। हाल ही में प्रमुख वित्त सचिव द्वारा प्रस्तुत वित्तीय स्थिति में महंगाई भत्ता फ्रीज करने, पेंशन बकाया रोकने तथा विभिन्न सामाजिक योजनाओं में कटौती के संकेत दिए गए हैं।
समिति ने सवाल उठाया कि जब वित्तीय संकट का हवाला देकर कर्मचारियों और पेंशनरों के अधिकार रोके जा रहे हैं, तो फिर लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की पेंशन में कई गुना वृद्धि, माननीयों के वेतन-भत्तों में बढ़ोतरी, सलाहकारों की नियुक्तियां और कैबिनेट रैंक के विस्तार जैसे निर्णय कैसे लिए जा रहे हैं?
प्रदेश अध्यक्ष सुरेश ठाकुर ने कहा कि सरकार की प्राथमिकताएं जनहित से भटक चुकी हैं। उनके अनुसार वित्तीय कुप्रबंधन और मित्र मंडली को लाभ पहुंचाने की नीतियों ने सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ डाला है, जबकि पेंशनरों और कर्मचारियों की करोड़ों रुपये की देनदारियां लंबित पड़ी हैं।
धरने के अंत में समिति ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि सरकार ने शीघ्र वार्ता कर लंबित मांगों का समाधान नहीं किया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। पेंशनरों का कहना है कि यह लड़ाई केवल पेंशन की नहीं, बल्कि सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य की स्थिरता की

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