शिमला, 13 फरवरी 2026, राज्य ब्यूरो चीफ विजय समयाल
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर चल रहे संवैधानिक और प्रशासनिक विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुक्खू सरकार को एक महीने की अतिरिक्त राहत मिलना प्रदेश हित के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इससे पहले हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 30 अप्रैल तक पंचायत चुनाव कराने के आदेश दिए थे, किंतु राज्य सरकार ने इन आदेशों को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई यह अंतरिम राहत प्रशासन को आवश्यक तैयारियों और आपदा प्रबंधन कार्यों को प्राथमिकता देने का अवसर प्रदान करती है।
गौरतलब है कि 31 जनवरी को प्रदेश की पंचायतों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। ऐसे में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाना अनिवार्य है, किंतु वर्तमान परिस्थितियों में राज्य सरकार ने हालिया भारी वर्षा और प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का हवाला दिया। कई क्षेत्रों में सड़क, पेयजल और विद्युत ढांचे की बहाली अभी भी जारी है। सरकार का तर्क है कि प्रदेश में आपदा प्रबंधन अधिनियम लागू है और राहत व पुनर्वास कार्य सर्वोच्च प्राथमिकता पर हैं।
राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि आपदा प्रबंधन अधिनियम संसद द्वारा निर्मित कानून है, जिसकी प्राथमिकता राज्य के पंचायती राज अधिनियम से अधिक है। चुनाव प्रक्रिया एक व्यापक प्रशासनिक अभ्यास है, जिसमें मतदाता सूची अद्यतन, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, सुरक्षा प्रबंधन और कार्मिकों की तैनाती शामिल है। आपदा की स्थिति में इन सभी व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से संचालित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
हिमाचल जैसे भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य में प्राकृतिक आपदाएं अक्सर प्रशासनिक संतुलन को प्रभावित करती हैं। ऐसे में यदि चुनाव जल्दबाजी में कराए जाते हैं और राहत कार्य बाधित होते हैं, तो इसका सीधा प्रभाव आम नागरिकों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर, लोकतांत्रिक संस्थाओं का समय पर गठन भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए न्यायालय द्वारा दिया गया यह अतिरिक्त समय सरकार के लिए एक जिम्मेदारी भी है—कि वह इस अवधि का उपयोग पारदर्शी तैयारी, मतदाता विश्वास बहाली और आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए करे।
अब अंतिम निर्णय आगामी सुनवाई में स्पष्ट होगा, किंतु फिलहाल यह राहत हिमाचल के समग्र हित में संतुलन साधने का अवसर प्रदान करती है। सरकार के लिए यह समय राजनीतिक बहस से ऊपर उठकर प्रशासनिक दक्षता और जनकल्याण को प्राथमिकता देने की परीक्षा है।

