मेरा रंग दे बसंती चोला माए रंग दे, मेरा रंग दे बसंती चोला माए रंग दे | निकले हैं वीर जिया ले यूं अपना सीना ताने, है है के जान लुटाने,आज़ाद सवेरा लाने | मर के कैसे जीते हैं,इस दुनिया को बतलाने, तेरे लाल चले हैं माए,अब तेरी लाज बचाने | आज़ादी का शोला बन के खून रगों में डोला, मेरा रंग दे…

मां भारती के चरणों में अपना सर्वस्व अर्पित कर देना ही यदि परम त्याग है, तो भगत सिंह उस त्याग की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। वे उन विरले स्वतंत्र सेनानियों में से थे, जिन्होंने मृत्यु को भय नहीं, बल्कि दुलहन की तरह स्वीकार किया। फांसी का फंदा उनके लिए आतंक नहीं था, वह तो मातृभूमि के लिए दी जाने वाली अंतिम आहुति का पावन वरमाला था, जिसे वे हंसते-हंसते पहन गए। 23 वर्ष की अल्पायु में ऐसा विराट साहस, ऐसी अडिग निष्ठा और ऐसा बेमिसाल बलिदान—इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ। उनका परिवार स्वयं क्रांतिकारी चेतना से ओतप्रोत था। बचपन से ही उन्होंने जलियांवाला बाग जैसे नरसंहारों की कहानियां सुनीं, अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार देखे और इन्हीं अनुभवों ने उनके मन में स्वतंत्रता की ज्वाला को प्रज्वलित किया। वे केवल भावुक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि गहरे चिंतनशील विचारक भी थे। पुस्तकों से उन्हें विशेष प्रेम था—लेनिन, मार्क्स और समाजवादी विचारधारा ने उनके चिंतन को दिशा दी। उनके लिए आज़ादी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि शोषण-मुक्त, समानता-आधारित समाज की स्थापना थी।

नौजवान भारत सभा की स्थापना कर उन्होंने युवाओं को संगठित किया और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़कर सशस्त्र क्रांति के मार्ग को चुना। उनका उद्देश्य अराजकता नहीं, बल्कि सोई हुई ब्रिटिश सरकार को जगाना था। यही कारण था कि 1929 में केंद्रीय विधानसभा में बम फेंकते समय उन्होंने यह स्पष्ट किया—“बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।” वह बम जान लेने के लिए नहीं था, बल्कि विचारों की गूंज पैदा करने के लिए था। गिरफ्तारी के बाद भी उनका आत्मविश्वास अडिग रहा। अदालत को उन्होंने संघर्ष का मंच बना दिया, जहां उनके शब्द गोलियों से अधिक तीखे सिद्ध हुए।

लाला लाजपत राय की मृत्यु ने उनके हृदय को भीतर तक झकझोर दिया। अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या उस अन्याय का प्रतिकार थी, जिसे भगत सिंह और उनके साथियों ने राष्ट्र के अपमान के रूप में देखा। लाहौर षड्यंत्र मामले में जब उन्हें सुखदेव और राजगुरु के साथ फांसी की सजा सुनाई गई, तब भी उनके चेहरे पर भय की रेखा नहीं थी। वे जानते थे कि उनका अंत नहीं, बल्कि आरंभ है—एक ऐसी चेतना का, जो आने वाली पीढ़ियों को झकझोर देगी।
23 मार्च 1931 की संध्या, लाहौर जेल—जब फांसी का समय आया, तब तीनों क्रांतिकारी देशभक्ति के गीत गुनगुनाते हुए आगे बढ़े। भगत सिंह के हाथ में किताब थी, आंखों में स्वप्न था और होंठों पर मुस्कान। फांसी का फंदा उनके लिए मृत्यु का प्रतीक नहीं, बल्कि मां भारती की सेवा में अंतिम प्रण था। कहा जाता है कि उन्होंने हंसते-हंसते फंदे को चूम लिया—मानो वह उनकी दुलहन हो, जो उन्हें अमरता के पथ पर ले जाने आई हो।

भगत सिंह की विचारधारा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। वे धर्मनिरपेक्ष भारत के स्वप्नदृष्टा थे, जहां धर्म व्यक्ति का निजी विषय हो और राष्ट्र समानता व न्याय पर आधारित हो। उन्होंने नास्तिकता पर भी खुलकर लिखा—किसी विद्रोह के आवेश में नहीं, बल्कि तर्क और विवेक के आधार पर। उनके लेखन में राष्ट्रप्रेम भावुकता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में प्रकट होता है। वे चाहते थे कि युवा केवल नारे न लगाएं, बल्कि समाज की कुरीतियों, असमानताओं और शोषण के विरुद्ध सचेत संघर्ष करें।
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का बलिदान केवल इतिहास का अध्याय नहीं, वह वर्तमान और भविष्य का पथप्रदर्शक है। उनका जीवन सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रप्रेम त्याग मांगता है—स्वार्थ, भय और आराम का त्याग। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि हंसते-हंसते दी गई कुर्बानी ही सबसे ऊंची होती है, क्योंकि उसमें आत्मा का भय नहीं, केवल कर्तव्य का प्रकाश होता है।
आज जब भी मां भारती का नाम लिया जाता है, भगत सिंह का स्मरण स्वतः हो जाता है। वे फांसी के फंदे पर झूलकर मरे नहीं—वे तो अमर हो गए। उनकी हंसी आज भी युवाओं को ललकारती है, उनका विचार आज भी अन्याय से टकराने का साहस देता है और उनका बलिदान आज भी यह कहता है—देश के लिए जीना ही नहीं, जरूरत पड़े तो हंसते-हंसते मरना भी सीखो।

