शिमला में शुक्र वार को मुख्यमंत्री श्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की प्रैस वार्ता का मंथन चिंतन और विश्लेषण संपादक राम प्रकाश वत्स
हिमाचल प्रदेश में रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (RDG) को लेकर छिड़ा सियासी घमासान अब आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर राजनीतिक नीयत और संघीय व्यवस्था के मूल प्रश्नों तक पहुंच गया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का बीजेपी पर पलटवार केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों और विपक्ष की भूमिका पर तीखा राजनीतिक संदेश भी है।
मुख्यमंत्री का यह कहना कि यदि बीजेपी वास्तव में हिमाचल के हितैषी है तो उसे RDG की बहाली के लिए लोकभवन या सीधे प्रधानमंत्री के पास जाना चाहिए था, अपने आप में विपक्ष की राजनीति पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। बीजेपी जहां एक ओर कांग्रेस सरकार पर विधायक निधि और ऐच्छिक निधि रोकने के आरोप लगा रही है, वहीं मुख्यमंत्री का आरोप है कि केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ही प्रदेश के हक का पैसा रोक रही है। यह विरोधाभास जनता के सामने साफ है—एक तरफ आर्थिक संकट का कारण केंद्र की नीतियां, दूसरी तरफ उसी संकट का ठीकरा राज्य सरकार के सिर फोड़ने की कोशिश।
RDG का बंद होना हिमाचल जैसे सीमित संसाधनों वाले पहाड़ी राज्य के लिए गहरा झटका है। मुख्यमंत्री का यह कहना कि आजादी के बाद पहली बार RDG रोकी गई, इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करता है। सवाल यह नहीं है कि विधायक निधि कब बहाल होगी, बल्कि यह है कि राज्य की वित्तीय आत्मनिर्भरता को कमजोर करने वाली परिस्थितियां किसके कारण बनीं। सरकार का तर्क है कि जब तक आर्थिक स्थिति सुधरेगी नहीं, तब तक लोकलुभावन फैसले संभव नहीं हैं—यह तर्क राजनीतिक रूप से अलोकप्रिय हो सकता है, लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक जरूर है।
बीजेपी विधायकों पर ‘दुष्प्रचार’ का आरोप लगाकर मुख्यमंत्री ने विपक्ष की रणनीति को कटघरे में खड़ा किया है। उनका यह कहना कि सरकार ने 16वें वित्त आयोग और केंद्रीय वित्त मंत्री के समक्ष मजबूती से पक्ष रखा, कांग्रेस की उस राजनीतिक लाइन को दर्शाता है जिसमें केंद्र से टकराव नहीं, बल्कि अधिकारों की स्पष्ट मांग की बात की जा रही है। साथ ही, बीजेपी को साथ चलकर प्रधानमंत्री से मिलने का खुला निमंत्रण देना एक चतुर राजनीतिक दांव भी है—या तो विपक्ष सहयोग करे, या फिर जनता के सामने उसकी कथनी-करनी का अंतर उजागर हो।
एक फरवरी को ‘काला दिन’ बताना भावनात्मक राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह संकेत भी है कि RDG का मुद्दा आने वाले दिनों में हिमाचल की राजनीति का केंद्रीय बिंदु बनने जा रहा है। विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर पिछले दस वर्षों में केंद्र से मिले संसाधनों का हिसाब जनता के सामने रखने की घोषणा, कांग्रेस सरकार को राजनीतिक नैरेटिव सेट करने का अवसर देगी।
कुल मिलाकर, RDG केवल आर्थिक सहायता का प्रश्न नहीं, बल्कि हिमाचल के संघीय अधिकारों, केंद्र की भूमिका और विपक्ष की जिम्मेदारी से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। अब देखना यह है कि बीजेपी इस चुनौती को सहयोग की राजनीति में बदलती है या फिर आरोपों की राजनीति में उलझकर हिमाचल के हितों को पीछे छोड़ देती है। जनता के लिए असली कसौटी यही होगी कि इस सियासी संग्राम में प्रदेश के हक के लिए कौन वास्तव में दिल्ली तक आवाज उठाता है।

