क्रांति की चिंगारी और प्रवासी भारतीयों का जागरण

बाबा सोहन सिंह भाखड़ा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन महान योद्धाओं में थे, जिनकी वीरता, शौर्य और त्याग ने विदेशी धरती पर भी गुलामी के विरुद्ध आग जलाई। 1870 में पंजाब के भाकना गाँव में जन्मे सोहन सिंह ने युवावस्था में ही रोज़गार की तलाश में कनाडा और अमेरिका की राह पकड़ी, लेकिन वहाँ भारतीयों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव, अपमान और ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी नीतियों ने उनके अंतर्मन को झकझोर दिया। उन्होंने यह समझ लिया कि केवल सुधारों से नहीं, बल्कि संगठित और सशक्त क्रांति से ही भारत को स्वतंत्र कराया जा सकता है। विदेश की धरती पर रहते हुए भी उनका हृदय भारत माता के लिए धड़कता रहा। उन्होंने प्रवासी भारतीय मजदूरों और किसानों को एकजुट कर यह विश्वास जगाया कि गुलामी की जंजीरें तोड़ना असंभव नहीं है, बस साहस और संकल्प की आवश्यकता है।
गदर पार्टी—वीरता और बलिदान का संगठित स्वरूप

1913 में सैन फ्रांसिस्को में स्थापित गदर पार्टी बाबा सोहन सिंह भाखड़ा की क्रांतिकारी दूरदृष्टि का परिणाम थी। वे इसके संस्थापक अध्यक्ष बने और लाला हरदयाल, करतार सिंह सराभा जैसे अमर क्रांतिकारियों के साथ मिलकर स्वतंत्रता का बिगुल फूंका। ‘युगांतर आश्रम’ से प्रकाशित “गदर” पत्रिका केवल एक समाचार पत्र नहीं, बल्कि गुलामी के विरुद्ध विद्रोह का घोषणापत्र थी। इसमें छपे लेख, कविताएँ और आह्वान भारतीयों को सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित करते थे। बाबा सोहन सिंह ने निडर होकर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और यह संदेश दिया कि आज़ादी भीख में नहीं मिलती, उसे बलिदान से प्राप्त करना पड़ता है। उनका नेतृत्व प्रवासी भारतीयों के लिए प्रेरणा बना और हजारों नौजवान मातृभूमि की मुक्ति के लिए कूद पड़े।
कारावास—अदम्य साहस और अटूट संकल्प की परीक्षा

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान गदर क्रांति को सफल बनाने के उद्देश्य से बाबा सोहन सिंह भारत लौटे, लेकिन 13 अक्टूबर 1914 को कलकत्ता में गिरफ्तार कर लिए गए। लाहौर षड्यंत्र केस में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अंडमान की सेल्युलर जेल, कोयम्बटूर और लाहौर की जेलों में उन्होंने 16 वर्षों से अधिक समय तक अमानवीय यातनाएँ सहीं। कठोर श्रम, एकांतवास और शारीरिक-मानसिक पीड़ा भी उनके क्रांतिकारी हौसले को तोड़ न सकी। जेल की कालकोठरी में भी वे आज़ादी के स्वप्न को जीवित रखते रहे। उनका जीवन इस बात का प्रतीक था कि सच्चा स्वतंत्रता सेनानी अत्याचारों के आगे झुकता नहीं, बल्कि और अधिक मजबूत होकर उभरता है।
आज़ादी के बाद भी संघर्ष और अमर विरासत
1930 में रिहा होने के बाद बाबा सोहन सिंह भाखड़ा ने विश्राम का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने मजदूर आंदोलनों, किसान सभाओं और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए संघर्ष जारी रखा। उनके लिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी और सम्मान का प्रश्न थी। 20 दिसंबर 1968 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका जीवन भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अमूल्य धरोहर बन गया। उनकी वीरता, शौर्य और त्याग आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि राष्ट्र की मुक्ति के लिए व्यक्तिगत सुख, आराम और जीवन तक का बलिदान करना ही सच्चा देशप्रेम है। बाबा सोहन सिंह भाखड़ा का नाम भारतीय इतिहास में सदैव क्रांति की ज्वाला बनकर जीवित रहेगा।

