Reading: धारावाहिक भारत के स्वतंत्र सैनानी (65)स्वतंत्रता की हर भोर उन असंख्य बलिदानों की लालिमा से रंगी है, जिनमें युवाओं ने हँसते-हँसते अपने प्राण मातृभूमि के चरणों में अर्पित कर दिए।

धारावाहिक भारत के स्वतंत्र सैनानी (65)स्वतंत्रता की हर भोर उन असंख्य बलिदानों की लालिमा से रंगी है, जिनमें युवाओं ने हँसते-हँसते अपने प्राण मातृभूमि के चरणों में अर्पित कर दिए।

RamParkash Vats
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में युवा अवस्था में अपने आप को मातृभूमि के लिए राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने फंदे को भारत माता का‌ जयकारा लेकर‌ चूम लिया

भारत के स्वतंत्र सैनानीयों को कोटि -कोटि नमन न्यूज इंडिया आजतक संपादक राम प्रकाश वत्स

यह आज़ादी कोई उपहार नहीं थी—यह उन वीरों की अंतिम सांसों, उनके अटूट साहस और अडिग विश्वास का परिणाम थी, जिन्होंने फाँसी के फंदे को भी वंदे मातरम् का जयघोष बना दिया। ऐसे ही अमर शहीदों में एक नाम है—राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी—जिनका जीवन और बलिदान स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथा का स्वर्णिम अध्याय है।29 जून 1901 को बंगाल के पबना जिले के मोहनपुर गाँव में जन्मे लाहिड़ी बचपन से ही तेजस्वी और देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। वाराणसी में Banaras Hindu University में शिक्षा ग्रहण करते हुए उनका झुकाव क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर हुआ। यह वही समय था जब देश का युवा वर्ग अंग्रेजी हुकूमत की जंजीरों को तोड़ने के लिए आतुर था।लाहिड़ी केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक क्रांति की चिंगारी थे। वे राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और चंद्रशेखर आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों के साथी बने। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने सशस्त्र क्रांति का मार्ग अपनाया—क्योंकि उनके लिए गुलामी से मुक्ति ही सर्वोच्च धर्म था।9 अगस्त 1925 का दिन भारतीय इतिहास में अमिट है, जब काकोरी कांड को अंजाम दिया गया। इस साहसिक योजना में लाहिड़ी की भूमिका निर्णायक थी—ट्रेन की चेन खींचकर उसे रोकने का कार्य उन्होंने ही किया, जिससे अंग्रेजी खजाने को कब्जे में लिया जा सके। यह केवल एक डकैती नहीं, बल्कि ब्रिटिश सत्ता को खुली चुनौती थी।अंग्रेजी हुकूमत उनके साहस से भयभीत थी। उन्हें गिरफ्तार किया गया और फाँसी की सज़ा सुनाई गई। लेकिन अत्याचार की हद तब पार हुई जब तय तिथि 19 दिसंबर 1927 से दो दिन पहले ही, 17 दिसंबर को उत्तर प्रदेश की गोंडा जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। यह भय था—एक ऐसे क्रांतिकारी का, जिसकी विचारधारा मृत्यु के बाद भी जीवित रह सकती थी।फाँसी के फंदे पर चढ़ते समय भी लाहिड़ी अडिग थे। उन्होंने मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि पुनर्जन्म माना—एक ऐसे भारत के लिए, जो स्वतंत्र, स्वाभिमानी और न्यायपूर्ण हो। उनका विश्वास था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हृदय में स्वतंत्रता की ज्योति जलाता रहेगा।आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस लेते हैं, तो यह याद रखना हमारा कर्तव्य है कि यह आज़ादी उन अमर बलिदानों की देन है। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे वीर सपूत हमें यह सिखाते हैं कि देश के लिए जीना और मरना ही

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