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गुमनाम वीर पंडित ब्रह्मानंद: त्याग, संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा, जिनकी कुर्बानियों की नींव पर स्वतंत्र भारत गर्व से खड़ा है

RamParkash Vats
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मेरी कलम स्वतंत्र सैनानीयों के प्रति सर्मपित: संपादक राम प्रकाश वत्स

आज का स्वतंत्र भारत किसी एक दिन की घटना या किसी एक महान नाम की देन नहीं है। यह उन असंख्य गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, तपस्या और बलिदान का प्रतिफल है, जिन्होंने इतिहास की मुख्यधारा से दूर रहकर राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। ऐसे ही वीर सपूतों में पंडित ब्रह्मानंद का नाम श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। घने जंगलों, बीमारी, भूख और मृत्यु के साए में भी उन्होंने “जय हिंद” का उद्घोष नहीं छोड़ा और मातृभूमि की आज़ादी को अपने जीवन से बड़ा माना।

24 मई 1914 को अमृतसर के बटाला में पंडित भगत राम के घर जन्मे पंडित ब्रह्मानंद बचपन से ही तेजस्वी और राष्ट्रप्रेम से ओत-प्रोत थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लाहौर से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। इसके उपरांत उनका परिवार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में आकर बस गया। यहीं से उनके जीवन में राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन की स्पष्ट दिशा तय हुई।
युवावस्था में ही वे अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के विरुद्ध सक्रिय हो गए। उन्होंने रैलियों, सभाओं और आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वे साइमन कमीशन विरोध (1928), नमक सत्याग्रह (1930), नमक स्वराज्य आंदोलन, तथा शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के समर्थन में तिरंगा फहराने जैसे साहसिक कार्यों में शामिल रहे। द्वितीय विश्व युद्ध के समय भी उन्होंने अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया। इन गतिविधियों के कारण उन्हें लाहौर, धर्मशाला, कराची और पालमपुर की जेलों में कठोर यातनाएँ सहनी पड़ीं।
पंडित ब्रह्मानंद कांग्रेस की वार्षिक बैठकों में नियमित रूप से भाग लेते थे, जहाँ उन्हें महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महान नेताओं का सान्निध्य मिला। 10 जून 1939 को उन्होंने कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए चंबा और कांगड़ा जिलों में व्यापक सर्वेक्षण किया और अपनी रिपोर्ट कांग्रेस के पाँच प्रांतों में प्रस्तुत की। उनके अथक परिश्रम और निष्ठा से प्रभावित होकर उन्हें कांगड़ा जिला ऑर्गेनाइज़र नियुक्त किया गया, जिसके लिए उन्हें 40 रुपये मासिक वेतन दिया जाता था। यहीं से कांग्रेस गतिविधियों में उनकी गहरी और संगठित भूमिका प्रारंभ हुई।
स्वतंत्रता के बाद भी उन्होंने जनसेवा का मार्ग नहीं छोड़ा। वर्ष 1968 से 1972 तक वे धर्मशाला निर्वाचन क्षेत्र से हिमाचल प्रदेश विधानसभा के सदस्य (एम.एल.ए.) नामांकित किए गए। उस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार थे। इसके अतिरिक्त, वे 1972 से 1976 तक स्वतंत्रता सेनानी संघ के अध्यक्ष भी रहे और आज़ादी के संघर्ष की स्मृतियों को जीवित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
14 फरवरी 1982 को नगरोटा बगवां में उन्होंने अंतिम सांस ली। पंडित ब्रह्मानंद केवल कांगड़ा क्षेत्र के ही नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के गौरव थे। उनका जीवन साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति की प्रेरणादायी मिसाल है।

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