विजली स्मार्ट मीटर समय की मांग और सुविधा जनक है। इससे विजली उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी लेकिन उपभोक्ताओं को इसके गुणों से अवगत करना भी न्याय संगत है । ताकि बिना हिचकिचाहट से बिजली उपभोक्ताओं की पसंद बने। इसमें फैली भ्रांतियां का समाधान करना होगा।

हिमाचल प्रदेश में आधुनिक स्मार्ट बिजली मीटर लगाने की प्रक्रिया को लेकर जनता के बीच जो शंकाएँ और आशंकाएँ उभर रही हैं, उन्हें सिरे से खारिज करना न तो व्यावहारिक है और न ही लोकतांत्रिक। सरकार और बिजली विभाग भले ही इसे तकनीकी उन्नयन और पारदर्शिता की दिशा में एक बड़ा कदम मान रहे हों, लेकिन आम उपभोक्ता के मन में बैठा डर और असंतोष अपने आप में एक गंभीर चेतावनी है। यह संकेत है कि कहीं न कहीं तैयारी, संवाद और विश्वास-निर्माण में कमी रह गई है, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य में बड़े सामाजिक असंतोष का कारण बन सकता है।
स्मार्ट मीटर का उद्देश्य उपभोक्ता को सशक्त बनाना था—रियल टाइम खपत की जानकारी, सटीक बिलिंग और बिजली चोरी पर प्रभावी नियंत्रण। किंतु उत्तर प्रदेश का हालिया अनुभव इस दावे पर सवाल खड़े करता है। वहां उपभोक्ता परिषद को हस्तक्षेप करना पड़ा और एक प्रमुख मीटर निर्माण कंपनी को गुणवत्ता मानकों की अनदेखी के आरोप में नोटिस जारी किया गया। यह प्रकरण बताता है कि तकनीक का क्रियान्वयन यदि कमजोर निगरानी और जवाबदेही के साथ हो, तो वही तकनीक समस्या का कारण बन जाती है।
उत्तर प्रदेश में लगभग आठ लाख उपभोक्ता ऐसे हैं जिन्हें अपने स्मार्ट प्रीपेड मीटर का शेष बैलेंस तक स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहा। अत्यधिक बिल, मीटर के असामान्य रूप से तेज चलने, नेटवर्क फेल होने और शिकायतों के समय पर समाधान न होने जैसी समस्याओं ने “स्मार्ट” मीटर को लोगों की नजर में “संकट” मीटर बना दिया है। जब तकनीक आम उपभोक्ता की समझ से बाहर हो और उसकी शिकायतों का कोई त्वरित समाधान न मिले, तो भरोसे का टूटना स्वाभाविक है।
इन्हीं अनुभवों के बीच हिमाचल प्रदेश को विशेष सतर्कता बरतनी होगी। पहाड़ी राज्य में नेटवर्क की सीमाएँ, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ और मौसम की चुनौतियाँ पहले से मौजूद हैं। यदि मैदानी राज्य उत्तर प्रदेश में यह तकनीक उपभोक्ताओं को परेशान कर रही है, तो हिमाचल में बिना ठोस तैयारी इसे लागू करना और भी जोखिम भरा हो सकता है। यहां उठ रही शंकाएँ विरोध नहीं, बल्कि पूर्व अनुभवों से उपजा विवेकपूर्ण सवाल हैं।
सकारात्मक पहल यह है कि स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर देशभर में बढ़ते विरोध और शिकायतों के बीच भारत सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझा है। ऊर्जा मंत्रालय के निर्देश पर 9 से 23 फरवरी 2026 तक पूरे देश में “स्मार्ट मीटर पखवाड़ा” आयोजित किया जाएगा, जिसके तहत बिजली कंपनियों की टीमें घर-घर जाकर मीटर की कार्यप्रणाली का प्रदर्शन करेंगी और उपभोक्ताओं से अनिवार्य रूप से फीडबैक लेंगी। यह कदम तभी सार्थक होगा, जब फीडबैक को औपचारिकता नहीं, बल्कि नीति-सुधार का आधार बनाया जाए।
देश की सर्वोच्च ऊर्जा संस्था सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी के सदस्य एवं उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा नेअवधेश कुमार वर्मा ने उत्तर प्रदेश सहित देश के सभी विद्युत उपभोक्ताओं से अपील की है कि जब उनके घर पर स्मार्ट मीटर का प्रदर्शन सत्र आयोजित हो, तो वे अपनी सभी समस्याएं—जैसे अधिक बिल, मीटर तेज चलना, बैलेंस न दिखना या अन्य कोई भी परेशानी—लिखित रूप में दर्ज कराएं, ताकि स्मार्ट प्रीपेड मीटर की खामियों को लेकर उपभोक्ताओं की सामूहिक और मजबूत आवाज भारत सरकार तक पहुंच सके और बिजली कंपनियों की मनमानी पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

