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हिमाचल की राजनीति का निर्भीक अध्याय: डॉ. सालिग राम का संघर्ष, विचार और विरासत

RamParkash Vats
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हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे रहे हैं जिन्होंने सत्ता की सुविधाओं से अधिक सिद्धांतों, संघर्ष और जनहित को महत्व दिया। डॉ. सालिग राम उन्हीं में से एक थे। वे केवल एक चिकित्सक या राजनेता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम की चेतना से निकले ऐसे जननायक थे, जिन्होंने हिमाचल की राजनीति को वैचारिक दृढ़ता और निर्भीकता दी।
15 अगस्त 1909 को कांगड़ा जिले के उस्तेहर गांव में जन्मे डॉ. सालिग राम का जीवन शिक्षा, सेवा और संघर्ष का संगम रहा। लाहौर के डीएवी कॉलेज और इंदौर के किंग एडवर्ड मेडिकल स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने चिकित्सक के रूप में समाज सेवा का मार्ग चुना, लेकिन देश की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय की पुकार ने उन्हें राजनीति की ओर मोड़ दिया। 1922 में असहयोग आंदोलन में भाग लेकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वे केवल अपने पेशे तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से उनका जुड़ाव 1937 में हुआ और यहीं से उनका राजनीतिक जीवन हिमाचल की जनभावनाओं से जुड़ता चला गया। स्वतंत्रता के बाद वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे और कांगड़ा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में हिमाचल प्रदेश के विस्तार और सशक्तिकरण के शुरुआती प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभाई। उस दौर में, जब पहाड़ी क्षेत्रों की आवाज़ राष्ट्रीय मंच पर कम सुनी जाती थी, डॉ. सालिग राम ने हिमाचल के हितों को मुखरता से रखा।
1966 से 1972 तक राज्यसभा सांसद के रूप में उनका कार्यकाल इस बात का प्रमाण है कि वे राष्ट्रीय राजनीति में भी हिमाचल की चिंताओं को मजबूती से उठाने वाले नेता थे। लेकिन उनका सबसे चर्चित और विवादास्पद दौर 1972 के बाद शुरू हुआ, जब वे जसवान विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने और कृषि मंत्री नियुक्त हुए। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. परमार के साथ वैचारिक मतभेदों के कारण वे सत्ता के भीतर रहते हुए भी विपक्ष की भूमिका निभाते दिखे। यह हिमाचल की राजनीति में दुर्लभ उदाहरण है, जब किसी नेता ने मंत्री पद की कीमत पर भी अपने मतभेदों को छिपाया नहीं।
1973 में मंत्री पद से बर्खास्तगी ने उन्हें कमजोर नहीं किया, बल्कि एक सिद्धांतवादी नेता के रूप में उनकी छवि और मजबूत हुई। सत्ता से बाहर रहते हुए भी वे विधायक बने रहे और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रहे। 1977 में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने पर वे ठाकुर राम लाल की सरकार में लोक निर्माण मंत्री बने और अल्पकाल में ही अनेक विभागों का दायित्व संभाला। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक क्षमता और अनुभव के कारण वे हर नेतृत्व के लिए अपरिहार्य थे।
डॉ. सालिग राम का राजनीतिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि हिमाचल की राजनीति केवल सहमति और सत्ता-साझेदारी की नहीं, बल्कि वैचारिक संघर्ष और असहमति की भी रही है। वे डॉ. वाई.एस. परमार के विरोधी माने गए, लेकिन यह विरोध व्यक्तिगत नहीं, बल्कि नीतिगत था। आज के दौर में, जब राजनीति में अवसरवाद हावी है, डॉ. सालिग राम की निर्भीकता और सिद्धांतनिष्ठा एक प्रेरक आदर्श के रूप में सामने आती है।
हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी और प्रभावी राजनेता के रूप में डॉ. सालिग राम की विरासत हमें यह सिखाती है कि लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, बल्कि मजबूती है। उनका जीवन इस पहाड़ी राज्य के राजनीतिक इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे न केवल याद किया जाना चाहिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को पढ़ाया और समझाया भी जाना चाहिए।

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