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संपादकीय :जब डर अपराधी को नहीं, मुखबिर याफिर (सूचना देने वाले) को सताने लगे तो…….

RamParkash Vats
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Editorial viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

यह एक असहज लेकिन निर्विवाद सत्य है कि हमारे आपराधिक न्याय तंत्र में सबसे कमजोर कड़ी अपराधी नहीं, बल्कि वह आम नागरिक है जो अपराध के खिलाफ आवाज़ उठाना चाहता है। विडंबना यह है कि नागरिक अपराधी से उतना भयभीत नहीं होता, जितना पुलिस तंत्र के भीतर सूचना लीक हो जाने के बाद संभावित प्रतिशोध से डरता है। यही डर जनता और पुलिस के बीच बने “विश्वास के सेतु” को बार-बार ढहा देता है।

जब तक मुखबिर याफिर (सूचना देने वाले) की पहचान और सुरक्षा की पूर्ण गारंटी नहीं होगी, तब तक कानून व्यवस्था मजबूत होने का दावा खोखला ही रहेगा। इस पृष्ठभूमि में एक “स्पेशल विंग” या पृथक गोपनीय इकाई का विचार केवल सुझाव नहीं, बल्कि समय की अनिवार्यता बन चुका है।

तकनीक बने भरोसे की ढाल:-अपराध नियंत्रण के इस युग में सूचना का प्रवाह मानवीय संपर्क पर नहीं, बल्कि सुरक्षित डिजिटल माध्यमों पर आधारित होना चाहिए। अनाम डिजिटल पोर्टल—ऐसा मंच जहाँ नाम, नंबर या ई-मेल की कोई आवश्यकता न हो—सूचना देने वाले के भय को काफी हद तक समाप्त कर सकता है।यदि इसमें ब्लॉकचेन तकनीक का उपयोग हो, तो न केवल डेटा सुरक्षित रहेगा बल्कि यह भी सुनिश्चित होगा कि सूचना से छेड़छाड़ या उसका स्रोत पता लगाना असंभव हो जाए। यह तकनीक पुलिसिंग को पारदर्शी और जवाबदेह बना सकती है।

जीरो कॉन्टैक्ट’ नीति: डर से मुक्ति की दिशासूचना देने वाले को थाने बुलाना, बयान के नाम पर उसे सार्वजनिक दायरे में लाना—ये सभी तरीके आज अप्रासंगिक और खतरनाक हो चुके हैं। ‘जीरो कॉन्टैक्ट’ सूचना प्रणाली के तहत मुखबिर और पुलिस के बीच प्रत्यक्ष संपर्क पूरी तरह समाप्त होना चाहिए।

आवश्यकता पड़ने पर इन-कैमरा या वर्चुअल गवाही, वह भी वॉइस डिस्टॉर्टर जैसी तकनीक के साथ, अपनाई जानी चाहिए। इसके साथ ही हर जिले में एक स्वतंत्र नोडल अधिकारी नियुक्त हो, जो केवल गुप्त सूचनाओं को संभाले और सीधे शीर्ष अधिकारियों को रिपोर्ट करे—बिना मध्यस्थों के।

इनाम, लेकिन पहचान के बिना :आज भी इनाम की प्रक्रिया मुखबिर याफिर (सूचना देने वाले) को उजागर कर देती है। यह व्यवस्था ही डर की जड़ है। समाधान है डिजिटल टोकन या अनाम रिवॉर्ड सिस्टम, जहाँ सत्यापित सूचना पर इनाम किसी डिजिटल वॉलेट या कूपन के माध्यम से मिले—बिना बैंक खाते और पहचान के।

जवाबदेही: लापरवाही नहीं, अपराध माना जाए:सबसे अहम प्रश्न पुलिस की जवाबदेही का है। यदि किसी भी स्तर पर सूचना लीक होती है और मुखबिर याफिर (सूचना देने वाले) को नुकसान पहुँचता है, तो इसे केवल “कर्तव्य में लापरवाही” न मानकर “अपराधी की सहायता” की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। संबंधित अधिकारी पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई ही व्यवस्था में अनुशासन ला सकती है।

गवाह सुरक्षा: व्यवस्था नहीं, संकल्प चाहिए :-एक प्रभावी व्हिसलब्लोअर या विटनेस प्रोटेक्शन यूनिट केवल सूचना एकत्र करने तक सीमित न रहे। उसे मुखबिर की सुरक्षा का नियमित ऑडिट करना चाहिए और गंभीर मामलों में पुनर्वास, स्थानांतरण या नई पहचान तक का प्रावधान करना चाहिए—जैसा कि कई विकसित देशों में वर्षों से लागू है।

संपादकीय दृष्टि कोण से सारगर्भित है कि -मुक्त समाज का मूल मंत्र साफ है—“डर अपराधी में होना चाहिए, सूचना देने वाले में नहीं।”यदि प्रशासन सचमुच एक अभेद्य “गोपनीयता की दीवार” खड़ी कर देता है, तो वही आम नागरिक पुलिस की सबसे बड़ी ताकत, उसकी आंख और कान बन सकता है। कानून तब केवल किताबों में नहीं, जमीन पर भी असर दिखाएगा।आज आवश्यकता किसी और अभियान की नहीं, बल्कि भरोसे को पुनर्स्थापित करने की है—क्योंकि बिना भरोसे के कोई भी कानून, कितनी ही सख्ती क्यों न रखे, निष्प्रभावी ही रहता है।

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