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संपादकीय – हिमाचल कांग्रेस की भीतरू खींचतान: सत्ता, प्रशासन और संवाद का संकट

RamParkash Vats
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Editorial viewpoint: Brainstorming and analysis, News India Aaj Tak. Chief Editor Ram Prakash Vats

हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार इन दिनों विपक्ष से ज़्यादा अंदरूनी असहमतियों के कारण सुर्खियों में है। लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) मंत्री विक्रमादित्य सिंह के बयान से उपजा विवाद अब केवल एक मंत्री और नौकरशाही तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि यह सीधे-सीधे मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और मंत्रिमंडल के भीतर सामंजस्य पर सवाल खड़े कर रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह टकराव विचारधारा से अधिक शासन-शैली और निर्णय प्रक्रिया को लेकर है।
सूत्र बताते हैं कि विवाद की चिंगारी तब भड़की जब विक्रमादित्य सिंह ने सार्वजनिक मंच से कुछ बाहरी राज्यों से आए IAS-IPS अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उनका तर्क था कि प्रदेश की भौगोलिक, सामाजिक और प्रशासनिक संवेदनशीलता को समझे बिना नीतिगत फैसले ज़मीनी स्तर पर असर नहीं छोड़ पा रहे। यह बयान कांग्रेस नेतृत्व के एक हिस्से को तो जनभावनाओं से जुड़ा साहसिक कदम लगा, लेकिन मुख्यमंत्री और सरकार के दूसरे खेमे ने इसे प्रशासनिक अनुशासन और सामूहिक जिम्मेदारी के खिलाफ माना।
मुख्यमंत्री सुक्खू का रुख अपेक्षाकृत संयमित रहा। उन्होंने विवाद को अनावश्यक तूल न देने और अफसरशाही के साथ टकराव से बचने का संकेत दिया। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री का मानना है कि सरकार और प्रशासन के बीच टकराव नहीं, तालमेल ही विकास की कुंजी है। यही कारण है कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से बयानबाज़ी के बजाय अंदरूनी संवाद को तरजीह दी। हालांकि, यही संयम कुछ मंत्रियों को निर्णयहीनता जैसा भी प्रतीत हुआ।
सरकार के भीतर यह मतभेद तब और स्पष्ट हुआ जब कुछ मंत्रियों ने खुलकर विक्रमादित्य सिंह का समर्थन किया, जबकि अन्य ने बयान से दूरी बनाते हुए मुख्यमंत्री के रुख को सही ठहराया। सूत्र बताते हैं कि यह केवल एक बयान का मामला नहीं है, बल्कि सत्ता के भीतर प्रभाव और भूमिका को लेकर भी असंतुलन की भावना काम कर रही है। युवा नेतृत्व, क्षेत्रीय संतुलन और संगठन बनाम सरकार की बहस इस विवाद की पृष्ठभूमि में लगातार उभर रही है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस सरकार के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या सरकार अपने भीतर संवाद और अनुशासन के बीच संतुलन साध पाएगी? यदि मंत्रियों की असहमति सार्वजनिक मंचों पर यूं ही सामने आती रही, तो विपक्ष को मुद्दे मिलेंगे और प्रशासनिक मशीनरी में असमंजस बढ़ेगा। दूसरी ओर, यदि असहमति को दबाने की कोशिश की गई, तो भीतर ही भीतर असंतोष पनपने का खतरा रहेगा।
सारगर्भित है कि यह विवाद किसी एक मंत्री या अधिकारी का नहीं, बल्कि शासन के चरित्र का प्रश्न है। कांग्रेस सरकार के लिए यह समय आत्ममंथन का है—जहाँ स्पष्ट संवाद, सामूहिक जिम्मेदारी और राजनीतिक परिपक्वता के ज़रिये न केवल अंदरूनी मतभेद सुलझाए जाएं, बल्कि जनता को यह भरोसा भी दिया जाए कि सरकार विकास और सुशासन के अपने वादे पर पूरी तरह केंद्रित है। संपादकीय पृष्ठ से यही अपेक्षा है कि सत्ता को आईना दिखाया जाए—ताकि विवाद नहीं, समाधान राजनीति की पहचान बने।

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