शिमला /10/01/2026/ चीफ़ ब्यूरो विजय समयाल
हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार से विशेष आर्थिक पैकेज की मांग कर न केवल राज्य की बिगड़ती आर्थिक स्थिति को उजागर किया है, बल्कि इसके माध्यम से एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी दिया है। नई दिल्ली में आयोजित बजट-पूर्व परामर्श बैठक में तकनीकी शिक्षा एवं टीसीपी मंत्री राजेश धर्माणी द्वारा उठाए गए मुद्दे इस बात की ओर इशारा करते हैं कि प्रदेश आज गंभीर वित्तीय दबाव से गुजर रहा है और मौजूदा संसाधन चुनौतियों से निपटने के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे हैं।
भारी मानसूनी वर्षा से हुई प्राकृतिक आपदाओं ने हिमाचल की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर गहरा आघात किया है। सड़कों, पुलों और सार्वजनिक ढांचे को हुए नुकसान ने राज्य के सामने पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 1500 करोड़ रुपये के विशेष राहत पैकेज की अब तक पूर्ण रिहाई न होना राजनीतिक बहस का विषय बन गया है। राज्य सरकार इसे केंद्र की उदासीनता के रूप में देख रही है, जबकि केंद्र इसे प्रक्रिया और वित्तीय अनुशासन से जोड़ता रहा है।
राजस्व घाटा अनुदान में लगातार हो रही कटौती ने प्रदेश की वित्तीय स्वायत्तता को और सीमित कर दिया है। वर्ष 2021-22 में जहां हिमाचल को 10,257 करोड़ रुपये का आरडीजी मिलता था, वहीं 2025-26 में यह घटकर 3,257 करोड़ रुपये रह जाना राज्य की आर्थिक सेहत पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इसके साथ ही जीएसटी मुआवजा बंद होने से हर साल हजारों करोड़ रुपये का नुकसान राज्य की आय संरचना को कमजोर कर रहा है।
ओपीएस लागू करने के कारण रोकी गई अतिरिक्त उधारी, बीबीएमबी परियोजनाओं के बकाया एरियर और केंद्रीय परियोजनाओं में अपेक्षित सहयोग की मांग यह दर्शाती है कि राज्य सरकार आर्थिक मुद्दों को राजनीतिक मंच पर मजबूती से उठा रही है। सेब बागवानी से जुड़ी मांगें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की नाराजगी को साधने का संकेत भी देती हैं।कुल मिलाकर, हिमाचल सरकार की यह पहल केवल वित्तीय सहायता की मांग नहीं, बल्कि केंद्र–राज्य संबंधों, संघीय ढांचे और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर भी एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म देती है।

