हिमाचल प्रदेश आज जिस आर्थिक मोड़ पर खड़ा है, वह केवल आंकड़ों की बाजीगरी से नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत निर्णयों से ही सुधर सकता है। प्रदेश की आर्थिक स्थिति लगातार कमजोर होती जा रही है और इसका सीधा असर विकास, रोजगार तथा जनजीवन पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। यह समय आत्ममंथन का है, न कि राजनीतिक कशमकश का।
*प्रदेश के पास प्रचुर प्राकृतिक संसाधन हैं—जल, वन, पर्यटन, औषधीय पौधे और जैव विविधता। इसके साथ-साथ गैर-प्राकृतिक संपदाओं जैसे मानव संसाधन, तकनीकी कौशल और उद्यमिता की भी अपार संभावनाएं मौजूद हैं। दुर्भाग्यवश, इन संसाधनों का योजनाबद्ध और टिकाऊ दोहन आज तक नहीं हो पाया। केवल बजटीय आंकड़ों में सुधार दिखा देना अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं करता; वास्तविक सुधार जमीन पर दिखना चाहिए।
*हिमाचल पर बढ़ता कर्ज का बोझ प्रदेश के विकास को लगभग ठप कर चुका है। स्थिति यह बन गई है कि बार-बार प्रदेश सरकारों को केंद्र के सामने कर्ज के लिए हाथ फैलाने पड़ते हैं। पिछले पांच दशकों में यह सिलसिला घटने के बजाय बढ़ता ही गया है। इस स्थिति के लिए भाजपा और कांग्रेस—दोनों ही दलों की सरकारें कमोबेश जिम्मेदार रही हैं। सत्ता बदलती रही, पर आर्थिक दिशा नहीं बदली।
*सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि सरकारी नौकरियों का अकाल पड़ गया है। रोजगार के अवसर सिमटते जा रहे हैं, जिससे युवाओं में निराशा बढ़ रही है और पलायन तेज हो रहा है। जब अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो उसका प्रभाव केवल सरकारी खजाने पर नहीं, बल्कि हर क्षेत्र—शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और पर्यटन—पर पड़ता है।
*सरकारों द्वारा मुफ्त योजनाओं को प्राथमिकता देना तात्कालिक राजनीतिक लाभ तो दे सकता है, पर दीर्घकाल में यह आर्थिक स्थिति को और भयावह बनाता है। सहायता और कल्याण जरूरी हैं, लेकिन वे आत्मनिर्भरता का विकल्प नहीं हो सकते। प्रदेश को ऐसी नीतियों की जरूरत है जो रोजगार सृजन करें, निजी निवेश को आकर्षित करें और स्थानीय उद्योगों को मजबूती दें।
*अब समय आ गया है कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों अपने संकीर्ण हितों से ऊपर उठकर प्रदेश और जनता के हितों को सर्वोपरि रखें। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर आर्थिक सुधारों पर साझा सहमति बने। यदि हिमाचल की अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं किया गया, तो पिछड़ापन और बढ़ेगा।
*हिमाचल को कर्ज पर नहीं, संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग, रोजगार के सृजन और दीर्घकालिक आर्थिक दृष्टि पर आगे बढ़ना होगा—यही प्रदेश की उन्नति और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुनिश्चित करेगा।
संपादकीय : हिमाचल को आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना होगा
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