News India Aaj Taj Office Crime Reporter Dr. Navneet Kumar Sharma
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में साइबर ठगी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ शातिर ठगों ने “डिजिटल अरेस्ट” का भय दिखाकर एक सेवानिवृत्त अधिकारी से 1.18 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। यह अपराध न केवल तकनीकी चालबाजी का उदाहरण है, बल्कि मानसिक दबाव और डर के सहारे की गई सुनियोजित ठगी की खतरनाक तस्वीर भी पेश करता है।
जांच में सामने आया है कि ठगों ने पीड़ित से वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क किया और खुद को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का वरिष्ठ अधिकारी बताया। कॉल पर मौजूद व्यक्ति ने बेहद गंभीर लहजे में पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग, नशीले पदार्थों की तस्करी और बैंक खातों के दुरुपयोग जैसे संगीन अपराधों में शामिल होने का आरोप लगाया। इसके साथ ही तत्काल गिरफ्तारी, बैंक खाते फ्रीज होने और सामाजिक बदनामी की धमकी दी गई।
(Pay attention to police instructions–डिजिटल अरेस्ट क्या है-Vigilance is protection)
***********(1) डिजिटल अरेस्ट कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह साइबर ठगों की नई ठगी की चाल है। इसमें अपराधी खुद को CBI, पुलिस, ED, या कोर्ट अधिकारी बताकर व्यक्ति को डराते हैं और कहते हैं कि वह किसी गंभीर अपराध में फँस चुका है।
(2) डिजिटल अरेस्ट कैसे किया जाता है?—- 1 ठगवीडियो कॉल या फोन कॉलकरते हैं2 कहते हैं कि आपके खिलाफमनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग्स, फर्जी अकाउंटजैसे मामले हैं3 धमकी देते हैं कितुरंत गिरफ्तारीहोगी 4 कहते हैं कि आप “डिजिटलअरेस्ट”मेंहैं, इसलिए 5 घर से बाहर नहीं जा सकते 6 किसी से बात नहीं कर सकते 7 फोन/वीडियो कॉल लगातार चालू रखना होगा
(3) ठगी कैसे होती है–डर के माहौल में ठग कहते हैं कि:“जांच के लिए” पैसे ट्रांसफर करें“केस से नाम हटाने” के लिए रकम जमा करें बैंक अकाउंट की जानकारी दे डर के कारण लोग लाखों–करोड़ों रुपये ठगों को दे देते हैं।**************
शिकायत के अनुसार ठगों ने फोन कॉल, वीडियो कॉल और ऑनलाइन माध्यमों का लगातार इस्तेमाल किया। पीड़ित को बताया गया कि वह “डिजिटल सर्विलांस” में है और उस पर 24 घंटे निगरानी रखी जा रही है। उसे सख्त चेतावनी दी गई कि वह किसी भी परिजन, मित्र, वकील या सरकारी एजेंसी से संपर्क न करे। ऐसा करने पर तत्काल गिरफ्तारी की बात कही गई।लगातार दबाव, धमकियों और मानसिक प्रताड़ना के कारण पीड़ित पूरी तरह घबरा गया। ठगों ने कथित जांच प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहा कि यदि उसे अपनी बेगुनाही साबित करनी है, तो अपनी जमा पूंजी “सरकारी खातों” में ट्रांसफर करनी होगी, जिसे जांच पूरी होने के बाद लौटा दिया जाएगा।
म्यूल अकाउंट्स के जरिए करोड़ों की हेराफेरी
जांच में यह भी सामने आया है कि जिन खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए, वे तथाकथित सरकारी खाते नहीं थे, बल्कि म्यूल अकाउंट्स थे—ऐसे फर्जी या किराए पर लिए गए खाते, जिनका इस्तेमाल साइबर अपराधी रकम को इधर-उधर घुमाने और अपनी पहचान छिपाने के लिए करते हैं। इसी जाल में फंसकर पीड़ित ने अपनी जीवनभर की कमाई गंवा दी और कुल 1.18 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी का शिकार हो गया।फिलहाल मामला साइबर क्राइम यूनिट के संज्ञान में है। जांच एजेंसियां कॉल डिटेल्स, बैंक ट्रांजैक्शन और डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर ठगों तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। यह घटना एक बार फिर चेतावनी देती है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों के नाम पर की जा रही साइबर ठगी से सतर्क रहना आज के डिजिटल दौर में बेहद जरूरी है।

