JAWALI/27/12/2025/NEWS INDIA AAJ TAK/ RAM PARKASH VATS
आईजीएमसी में डॉक्टर और मरीज के बीच हुई मारपीट की घटना के बाद एक डॉक्टर को बर्खास्त किए जाने से शुरू हुआ विवाद अब पूरे प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी पड़ने लगा है। डॉक्टरों की हड़ताल दूसरे दिन में प्रवेश कर चुकी है, वहीं अपनी मांगों को लेकर 108 और 102 एम्बुलेंस सेवाओं के कर्मी भी लगातार दूसरे दिन हड़ताल पर हैं। नतीजा यह है कि आम जनता, खासकर गरीब और दूरदराज़ क्षेत्रों से आने वाले मरीज, सबसे ज़्यादा पीड़ित हो रहे हैं।
डॉक्टरों की हड़ताल के चलते सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह लड़खड़ा गई हैं। सिविल अस्पताल ज्वाली सहित कई अस्पतालों में न तो मरीजों की पर्ची बन रही है और न ही नियमित जांच हो रही है। केवल आपातकालीन सेवाएं किसी तरह चलाई जा रही हैं। दूर-दराज़ से इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचे मरीजों को मजबूरन निजी क्लिनिकों का सहारा लेना पड़ रहा है, जहां महंगी दवाइयों और फीस ने उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है।
यह सवाल बेहद गंभीर है कि आखिर इस टकराव की नौबत क्यों आई? क्या केवल डॉक्टर को बर्खास्त कर देना ही समाधान था, या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच ज़रूरी थी? मरीज और डॉक्टर—दोनों ही इस व्यवस्था के अंग हैं। किसी भी प्रकार की हिंसा निंदनीय है, लेकिन प्रशासन की जल्दबाज़ी और संवादहीनता ने आग में घी डालने का काम किया है।
डॉक्टरों को अक्सर “धरती का भगवान” कहा जाता है, लेकिन जब वही डॉक्टर हड़ताल पर हों, तो मरीजों का रखवाला कौन बनेगा? दूसरी ओर, लगातार उपेक्षा और असुरक्षा की भावना से जूझ रहे डॉक्टर भी स्वयं को असहाय महसूस कर रहे हैं। ऐसे में गलती किसी एक पक्ष की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की है जो समय रहते संवाद और समाधान नहीं कर पाया।
यह एक स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति बनती जा रही है। सरकार को चाहिए कि वह बिना देरी किए दोनों पक्षों से बातचीत करे, निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे और ऐसा समाधान निकाले जिससे न डॉक्टर अपमानित हों, न मरीज बेबस बनें। स्वास्थ्य सेवाएं किसी भी हाल में ठप नहीं होनी चाहिए—क्योंकि यहां दांव पर केवल मांगें नहीं, इंसानी जानें लगी हैं।
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