विभागों का हर कार्य जनहित में होता है। सामूहिक जनहित की अनदेखी नहीं की जा सकती ।
यह विषय केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं, बल्कि संवेदनशील, जनहित और संभावित आपराधिक श्रेणी का है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, सड़क सुरक्षा नियमों की अनदेखी और मानव जीवन से हो रहा खुला खिलवाड़—ये सब मिलकर हिमाचल प्रदेश में विकास की उस तस्वीर को उजागर करते हैं, जो बाहर से चमकदार और भीतर से खोखली प्रतीत होती है।
यह विडंबना ही है कि लोक निर्माण विभाग और सरकार का वृक्षों को लेकर दोहरा चरित्र बार-बार सामने आता है। विकास के नाम पर आवश्यक और अनावश्यक—दोनों प्रकार के वृक्षों का बेहिसाब कत्ल कर दिया जाता है। कई बार तो स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि न्यायालय को भी हस्तक्षेप करना पड़ता है। प्रश्न यह है कि निर्जीव वृक्ष अपनी फरियाद किससे करें? और उससे भी बड़ा प्रश्न—जब यह सब हो रहा होता है, तब वन विभाग का मौन व्रत क्यों नहीं टूटता?
नियमों के अनुसार यदि वन विभाग 20 वृक्ष काटने की अनुमति देता है, तो वास्तविकता में तीन गुना अधिक वृक्ष काट दिए जाते हैं, और जिम्मेदारी तय नहीं होती। इसके ठीक विपरीत, यदि कोई सामान्य नागरिक एक वृक्ष अवैध रूप से काटते हुए पकड़ लिया जाए, तो उसे जीवन भर अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। यह कैसा न्याय है? क्या कानून केवल कमजोर के लिए है और विभागों के लिए नहीं?
यही दोहरापन लोक निर्माण विभाग के कामकाज में भी स्पष्ट दिखाई देता है। सड़क पर चलने वाले लोगों और वाहनों की सुरक्षा से खिलवाड़ करना जैसे एक आदत बन चुकी है। यह लापरवाही अनजाने में नहीं, बल्कि कई मामलों में जानबूझकर की जाती है—जहाँ प्रत्यक्ष प्रमाण की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। जानबूझकर की गई ऐसी चूक को किसी भी सूरत में “गलती” नहीं माना जा सकता।
सड़क निर्माण के स्पष्ट नियम हैं, जिनका पालन जनता और विभाग—दोनों पर समान रूप से लागू होता है। जानकारी के अनुसार, सड़क और उसके दोनों ओर निर्धारित सीमा (जैसे 2-2 मीटर) तक किसी भी प्रकार का अवरोध पैदा करने का अधिकार किसी को नहीं है। लेकिन वास्तविकता यह है कि लोक निर्माण विभाग स्वयं इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन करता है। सड़क से सटे भारी-भरकम वृक्षों को हटाने की जहमत नहीं उठाई जाती, जबकि वही वृक्ष धुंध, रात के समय या वाहन के अनियंत्रित होने की स्थिति में भयानक दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। परिणाम सामने है—प्रदेश स्तर पर हजारों लोग और वाहन काल का ग्रास बन चुके हैं।
यह सबसे बड़ा विरोधाभास है कि एक ओर सड़क निर्माण के नाम पर हजारों वृक्षों की बलि दे दी जाती है, और दूसरी ओर सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक, सड़क से सटे वृक्षों को छोड़ दिया जाता है, जो प्रतिदिन मानव जीवन के लिए खतरा बने हुए हैं। क्या यही संतुलित विकास है? क्या यही मानवता है?
इस विवेचना का उद्देश्य विकास को रोकना नहीं, बल्कि मानव जीवन, बहनों-बेटियों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण—इन तीनों के बीच संतुलन की मांग करना है। यदि लापरवाही जानबूझकर की जा रही है, तो वह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि नैतिक और कानूनी अपराध की श्रेणी में आती है। अब समय आ गया है कि सरकार, लोक निर्माण विभाग और वन विभाग—तीनों अपने दोहरे मानदंड छोड़ें, नियमों का समान रूप से पालन करें और यह स्वीकार करें कि विकास का अर्थ विनाश नहीं, बल्कि सुरक्षित और जिम्मेदार प्रगति है।

